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Nirbhaya Case: संवाद में बोलीं छात्राएं- फांसी में देर हुई तो पस्त नहीं होंगे गुनहगारों के हौसले

Wed, 05 Feb 2020 08:53 PM IST
विजय जैन डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
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संवाद के तहत अपने विचार रखती छात्राएं। - फोटो : अमर उजाला।
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बहादुर बेटी निर्भया के दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद इसकी तामीली में देरी समाज को उद्वेलित कर रही है। बेटियां बेहद नाराज हैं। उनका कहना है कि देर से मिला न्याय भी पीड़िता या फिर उसके परिवार के साथ अन्याय ही है। दोषियों को फांसी न दिया जाना सिस्टम के खोखलेपन को दर्शाता है।
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निर्भया कांड के दरिदों को फांसी पर लटकाने में देरी पर अमर उजाला फाउंडेशन की तरफ से बुधवार को सिटी ऑफिस में संवाद का आयोजन किया गया। इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट (आईटीएम) गीडा की शिक्षिका व छात्राओं ने इस मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखी। सबने कहा कि दोषियों को फांसी जल्द से जल्द देकर पीड़ित परिवार को न्याय और दुष्कर्म की मानसिकता रखने वालों को कानून का भय दिखाया जाए।

सजा मिलने में देरी से कुत्सित और आपराधिक मानसिकता वाले लोगों मेें न्यायपालिका और व्यवस्था का भय भी समाप्त हो रहा है। तो क्या ऐसे लोगों को हैदराबाद में पशु चिकित्सक से सामूहिक दुष्कर्म के दोषियों की तरह पुलिस मुठभेड़ की सजा दी जानी चाहिए? इसपर बेटियां कहती हैं कि यह विकल्प तो है लेकिन इससे न्यायपालिका, कार्यपालिका की भूमिका ही समाप्त हो जाएगी। पुलिस के अराजक होने का भी अंदेशा रहेगा।
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दोषियों को फांसी की सजा से बचाने के लिए जो कानूनी दांवपेंच खेले जा रहे हैं, उससे आम आदमी का न्याय व्यवस्था से विश्वास हट जाएगा। हैदराबाद में महिला डॉक्टर से दुष्कर्म के आरोपी मुठभेड़ में मारे गए, यह न्याय तो है लेकिन गलत, क्योेंकि पुलिस को न्यायपालिका की तरह फैसला लेने का अधिकार नहीं है।
- दिव्या प्रियदर्शिनी, शिक्षिका आईटीएम

निर्भया के दोषियों की फांसी बार-बार टालना गलत है। यह व्यवस्था सुधारी जानी चाहिए। दोषियों को सजा मिलने के बावजूद उन्हें फांसी पर नहीं चढ़ाया जाना, निर्भया के साथ अन्याय ही है। दोषी कानूनी दांवपेंच खेलकर लगातार बचने की कोशिश कर रहे हैं। यह कब खत्म होगा, देखने वाली बात है।
- अंकिता मालवीय, शिक्षिका आईटीएम


दुष्कर्म के मामलों में जल्द न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया था। बावजूद इसके निर्भया को ही सात साल बाद तक पूर्ण न्याय नहीं मिल सका है। यह चिंता का विषय है। निर्भया कांड का खौफ इतना है कि न जाने कितनी बेटियां, इसलिए कॅरियर नहीं बना सकीं कि उनके माता-पिता ने पढ़ने के लिए उन्हें बाहर नहीं जाने दिया।
- आकर्षिता पांडेय, बीटेक

दोषियों की फांसी टलवाने के लिए आर्टिफिशियल सिस्टम बनाए जा रहे हैं। दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों को बचाने के लिए कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। यदि दोषियों को जल्दी सजा मिलती तो दूसरे माता-पिता का विश्वास कानून पर बढ़ जाता। वह बेटियों को बाहर भेजने में संकोच नहीं करते।
- श्वेता सिंह, बीटेक


दोषियों के वकील बार-बार क्यूरेटिव पिटिशन डाल कर बेवजह उन्हें बचा रहे हैं। सरकार और न्यायपालिका को कुछ ऐसा काम करना होगा जिससे इस तरह की गंदी हरकत करने वालों में डर बैठे। 2012 में निर्भया के साथ वारदात के बाद देश में कई ऐसी घटनाएं हुईं। निर्भया के दोषियों को समय से सजा मिलती तो ऐसी सोच रखने वालों में डर पैदा होता।
- अनुराधा मल्ल बीटेक


परिवारों में यदि लड़कों को यह शिक्षा दी जाए कि जिस तरह तुम्हारी बहन है उसी तरह हर लड़की है तो शायद इस तरह की घटनाएं कम हो जाएं। लड़कों और लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं किए जाने की नसीहत हकीकत में लागू हो तभी न्यायपूर्ण समाज बनेगा। ऐसा हुआ तो किसी और निर्भया को लंबे समय तक न्याय का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
- महिमा सिंह बीटेक

निर्भया या अन्य किसी दुष्कर्म के मामले में दोषियों को सजा दिलाने के लिए व्यवस्था के तहत ही काम किया जाए, लेकिन बेवजह देरी ठीक नहीं है। कानून का सहारा दोषियों को बचाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें सजा दिलाने में लिया जाना चाहिए। इससे समाज में न्याय व्यवस्था के प्रति सकारात्मकता बढ़ेगी। किसी तरह का भ्रम नहीं होगा। आरोप-प्रत्योराप से भी बचा जा सकेगा।
- प्रियंका द्विवेदी, बीटेक

सरकार को चाहिए कि कानून का फायदा उठाने की व्यवस्था ही खत्म कर दे। निर्भया के दोषी अब दया की भीख मांग कर रहे हैं। जब उन्होंने दरिंदगी की थी तो क्या उन्हें दया आई थी? नहीं ना। फिर ऐसे लोगों को कभी दया याचिका, कभी क्यूरेटिव पिटिशन के नाम पर बार-बार सजा से बचाना पीड़ित परिवार को मानसिक प्रताड़ना और अन्याय से गुजारने के बराबर है।
- शालिनी यादव, बीटेक


दोषियों को फांसी से बचाने के लिए नियमों का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह सच है लेकिन सिर्फ एक केस के गुण-दोष के आधार पर नियमों में बदलाव किया जाना सही नहीं होगा। कोई भी नियम काफी सोच विचार कर बनाए जाते हैं। निर्भया का केस तो बिल्कुल साफ था लेकिन कई मामले झूठे भी होते हैं, यह नियम ऐसे ही निर्दोषों को सुरक्षा देते हैं। बेहतर होगा कि दोष सिद्ध होने के बाद सजा को जल्द से जल्द तामील करवाया जाए। 
- सुपर्णा मुखर्जी, एमबीए

निर्भया का केस में बिल्कुल साफ था। सबको पता है वही चारों दोषी हैं ऐसे में उन्हें सजा देने में देरी किया जाना न्यायपालिका और सरकार की कार्यशैली के बारे में बताता है। निर्भया का केस तो हाई प्रोफाइल था इसलिए आज उसके दोषियों को सजा दिलाने पर चर्चा हो रही है। दुष्कर्म की घटनाओं की संख्या बढ़ी है। उन पीड़िताओं को भी जल्द इंसाफ मिलना चाहिए।
- ऋतुजा पांडेय, एमबीए

न्यायपालिका को और बेहतर, प्रभावी तरीके से काम करने की जरूरत है। दुष्कर्म के मामलों में ट्रायल से लेकर फैसला, सजा सुनाया जाना और सजा दिलाया जाना इसके लिए समय सीमा निर्धारित की जाए। कम से कम दोष सिद्ध होने पर दी गई सजा तो बिना देरी किए लागू करवाई जाए। ऐसा होगा, तभी आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों में महिला अपराध के प्रति भय रहेगा। 
- शिवांगी गुप्ता, एमबीए
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चारों दोषियों को जब एक साथ ही फांसी की सजा सुनाई गई थी तो उन्हें दया याचिका भी एक साथ ही देने की व्यवस्था दी जानी चाहिए थी। यदि कई लोेगों को एक साथ फांसी की सजा दी गई है तो जब तक सबके अंतिम विकल्प नहीं खत्म हो जाते किसी को भी फांसी नहीं दी जाएगी, यह व्यवस्था ठीक नहीं है। निर्भया के आरोपित इसी का फायदा उठा रहे हैं।
- रक्षा सिंह, एमबीए

घटना के सात साल बाद भी निर्भया को न्याय नहीं मिला है। इससे उसके परिवार वाले भी भय की मनोदशा से गुजर रहे होंगे। उन्हें आज भी भय है कि न्याय मिलेगा या नहीं। उधर, दोषी फांसी की सजा मिलने के बाद भी अनंत काल तक न्यायपालिका को उलझा कर अपनी जान बचाने में कानूनी प्रावधान का दुरुपयोग कर रहे हैं, यह व्यवस्था खत्म होनी चाहिए। 
- सृष्टि सिंह एमबीए

दुष्कर्म के मामले बढ़ने पर इसके लिए भी लड़कियाें के कपड़े पहनने के ढंग को गलत बताया जाता है। यदि ऐसा है तो दो साल की बच्ची से के साथ दुष्कर्म क्यों होता? कई मामलों में वृद्धा के साथ भी हैवानियत की गई है। समाज को मानसिकता बदलने की जरूरत है। न्यायपालिका, सरकार और समाज को ऐसे प्रयास करने चाहिए कि लड़कियों और उनके परिजन भयमुक्त हों।
- श्रेया भाटिया, एमबीए
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