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UP News: गोरखपुर के कैंपियरगंज में नवजात का मिला शव, जांच में जुटी पुलिस

Thu, 25 Aug 2022 12:36 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

शव सड़क किनारे फेंका मिला। उसे एक प्लास्टिक में लपेटा गया था। उसी रास्ते जाते समय गांव के लोगों की नजर प्लास्टिक पर पड़ी। नजदीक जाकर देखा तो नवजात का शव था। उनकी सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज इलाके के तेंदुआ विशंभरपुर में पंचायत भवन के पास बुधवार को नवजात बच्चे का शव मिला। जानकारी होने पर आसपास के लोग जुट गए। पुलिस ने मौत की वजह जानने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं।

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जानकारी के मुताबिक, शव सड़क किनारे फेंका मिला। उसे एक प्लास्टिक में लपेटा गया था। उसी रास्ते जाते समय गांव के लोगों की नजर प्लास्टिक पर पड़ी। नजदीक जाकर देखा तो नवजात का शव था। उनकी सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची। इंस्पेक्टर रंजीत सिंह ने बताया कि जांच कराई जाएगी कि किसने और किस हाल में शव को फेंका था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही मौत के कारणों का पता चलेगा। उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इन धाराओं में केस दर्ज कर होनी चाहिए कार्रवाई

  • धारा 315 आईपीसी : शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के पश्चात मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया कार्य।
  • सजा : दस वर्ष तक कारावास और आर्थिक दंड
  • धारा 317 आईपीसी : माता-पिता या नवजात की देखरेख करने वाले व्यक्ति द्वारा 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे का परित्याग करना अपराध है।
  • सजा : सात साल की कैद या फिर जुर्माना या फिर दोनों
  • धारा 318 आईपीसी : नवजात को गोपनीय तरीके से जीवित अथवा मृत फेंकना अपराध है।
  • सजा : दो साल की कैद या जुर्माना या फिर दोनों।

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गोरखपुर में 154 साल बाद दर्ज हुई थी पहली एफआईआर

जिसके जन्मदाता ने ही उसे मार डाला या लावारिस छोड़ दिया, फिर उसके मामले में कौन सुनेगा? अमूमन नवजात का शव मिलने या उसके जीवित लावारिस मिलने पर पुलिस कोई मामला दर्ज ही नहीं करती। अमर उजाला ने नवजात के लावारिस मिलने पर 2019 में यह मामला उठाया तो धारा-317 के तहत गोरखपुर में पहली एफआईआर दर्ज हुई, वरना इससे पूर्व जनरल डायरी में शिशु के मिलने का उल्लेख करके पुलिस अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती थी। चौंकाने वाली बात थी कि गोरखपुर पुलिस के उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक इस कानून के बनने के 154 साल बाद यहां ऐसी कोई एफआईआर दर्ज हुई थी।

इन मामलों में पुलिस का कुतर्क रहता है कि कोई तहरीर ही नहीं देने वाला तो वे एफआईआर कैसे दर्ज करें? अमर उजाला की पहल पर तत्कालीन डीजीपी ओम प्रकाश सिंह ने प्रदेश भर में सर्कुलर जारी करके इस समस्या का समाधान भी किया था कि नवजात शिशु के मामले में तहरीर का इंतजार किए बिना, पुलिस स्वयं वादी बनकर मामला दर्ज करे। इसके बाद गोरखपुर में कई मामले दर्ज हुए। कुछ मामलों मेें पुलिस ही वादी भी बनी।

पीपीगंज में मौत के घाट उतारा गया था नवजात
कथित लोकलाज से बचने के लिए नवजात को मौत के घाट उतारने का कुकृत्य हमारे समाज में आदिकाल से होता चला आ रहा है। पाठकों केे पता होगा कि एक ऐसा ही मामला, अमर उजाला की कोशिशों से पीपीगंज में खुला था। 31 जनवरी 2020 को दर्ज इस मामले की तफ्तीश कैंपियरगंज थाना पुलिस ने की थी। इस मामले में एक प्रभावशाली परिवार के युवक ने एक नाबालिग को हवस का शिकार बनाया था। उससे एक बच्चे का जन्म हुआ। बिन ब्याही किशोरी मां और उसकी मां ने नवजात को मारकर फेंक दिया था। अमर उजाला की पड़ताल पर सक्रिय हुई पुलिस ने दुष्कर्म के आरोपी, नवजात को मौत के घाट उतारने वाली किशोरी मां और किशोरी की मां को हत्या के आरोप में 24 फरवरी 2020 को गिरफ्तार किया था।
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