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राप्ती नदी में नहीं गिरेगा गंदा पानी, इस तरीके से नालों का होगा ट्रीटमेंट

Fri, 13 Mar 2020 01:35 PM IST
vivek shukla डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर

सार

  • नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) नागपुर की टीम ने किया निरीक्षण
  • नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा योजना के तहत होनी है नालों की सफाई
  • अमृत योजना के तहत करीब साढ़े आठ करोड़ की लागत से बनाई जा रही है यह परियोजना
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राप्ती नदी का नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर की टीम ने किया निरीक्षण। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जल्द ही राप्ती नदी में गिरने वाले 10 नालों के गंदे पानी का प्राकृतिक तरीके से शोधन शुरू हो जाएगा। अमृत योजना के तहत करीब 8.5 करोड़ की लागत की यह योजना फिलहाल लघुकालिक योजना के रूप में कार्य करेगी और बाद में एसटीपी बनने के बाद उससे जोड़ दिया जाएगा। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा योजना के अंतर्गत नेशनल एनवारमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) नागपुर की टीम ने बृहस्पतिवार को इसका निरीक्षण किया। जल्द ही इसमें पांड (तालाब) बनाने का काम शुरू हो जाएगा। गंगा नदी की सहायक नदी होने की वजह से राप्ती नदी में गिरने वाले नालों के पानी को साफ करने का काम इस योजना में शामिल किया गया है।
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शहर में करीब 230 बड़े-छोटे नाले हैं। इन नालों का पानी राप्ती नदी के अलावा रामगढ़ ताल में गिरता है। रामगढ़ ताल में गिरने वाले नालों के पानी के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) तो लगा दिया गया है, लेकिन राप्ती नदी में अब भी बिना साफ किए ही नालों का पानी गिरता है। इनकी सफाई के लिए एसटीपी की आवश्यकता है, लेकिन इसमें काफी समय लगने वाला है। ऐसे में राप्ती नदी में गिरने वाले नालों को प्राकृतिक तौर पर स्वच्छ करने की योजना तैयार की गई है। 

बृहस्पतिवार को इस योजना के हेड डॉ. आत्या कापले के नेतृत्व में तीन सदस्य टीम ने तकिया घाट से लेकर राजघाट तक राप्ती नदी में गिरने वाले नालों का निरीक्षण किया। इस दौरान नगर निगम के चीफ इंजीनियर सुरेश चंद भी मौजूद रहे। नगर निगम के सहायक अभियंता आरके पांडेय ने बताया कि योजना के तहत तकियाघाट से राजघाट तक राप्ती नदी में गिरने वाले सभी नालों को टैप किया जाएगा। इनको प्राकृतिक विधि से शोधन करने के बाद पानी को राप्ती नदी में गिरने में दिया जाएगा। 
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ऐसे होगा काम

नालों का पानी शोधित करने के लिए फ्लोटिंग प्लांट, जियो टैंक, बैक्टीरिया आदि का उपयोग होगा। नाले के पानी में पौधे तैरते हैं, जिससे पानी में नाइट्रोजन व फास्फोरस की मात्रा घट जाती है। जियो टैंक में आर्गेनिक अशुद्धियां एकत्र होती हैं। इससे पानी में बॉडी आक्सीजन डिमांड व केमिकल आक्सीजन डिमांड 40 फीसद तक कम हो जाएगा। बैक्टीरिया का उपयोग कर नाइट्रोजन व फास्फोरस की मात्रा को नियंत्रित किया जाएगा।

इन नालों के पानी का होगा शोधन
ट्रांसपोर्टनगर, हांसुपुर, महेसरा, स्टेपिंग स्टोन, नेताजी सुभाष चंद्र बोस नगर, ग्रीन सिटी फेज -2, मिर्जापुर, बहरामपुर, घसियारी नाला, बसंतपुर

नालों के पानी का नीरी प्राकृतिक तरीके से उपचार करेगी। इसके अंतर्गत नालों के पानी में कुछ ऐसे बैक्टीरिया विकसित किए जाएंगे, जो पानी में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाएंगे। नीरी ने इसके लिए पूर्व में भी सर्वे किया है। योजना अंतिम चरण में है। बृहस्पतिवार को डॉ. आत्या कापले के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम ने निरीक्षण किया है। जल्द ही नालों के बीच में छोटे-छोटे तालाब बनाने का काम शुरू हो जाएगा। इसके बाद परियोजना तक तहत इसका काम शुरू हो जाएगा।
- सुरेश चंद, चीफ इंजीनियर, नगर निगम
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