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Gorakhpur News: उद्योगों पर बढ़ा वार्षिक रखरखाव कर का बोझ, एक ही शहर में अलग-अलग टैक्स

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गोरखपुर। शहर के औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित उद्योगों पर नगर निगम की ओर से लगाए जा रहा वार्षिक रखरखाव कर चर्चाओं में है। एक ही शहर में कर की दरें अलग-अलग हैं। दरों में चार गुना से अधिक का अंतर है। इससे उद्यमियों की नाराजगी बढ़ गई है।
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विकास नगर औद्योगिक क्षेत्र और भगवानपुर औद्योगिक क्षेत्र के उद्यमियों का कहना है कि नगर निगम की ओर से भेजा गया रखरखाव कर गीडा और यूपीसीडा की तुलना में साढ़े चार गुना तक अधिक है। इससे उद्योगों के संचालन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ेगा और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी प्रभावित होगी। उनकी मांग है कि नगर निगम की दरों को गीडा और यूपीसीडा के अनुरक्षण शुल्क के बराबर किया जाए, ताकि सभी औद्योगिक क्षेत्रों के उद्योगों को समान सुविधा और समान कर व्यवस्था मिल सके। हाल ही में उद्यमियों ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मिलकर भी इस संबंध में ज्ञापन सौंपा था।
शहर में मुख्य रूप से गीडा औद्योगिक क्षेत्र, इंडस्ट्रियल एरिया और इंडस्ट्रियल एस्टेट हैं। गीडा का रखरखाव गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण और इंडस्ट्रियल एरिया का प्रबंधन यूपीएसआईडीए (यूपीसीडा) करता है, जबकि इंडस्ट्रियल एस्टेट नगर निगम के दायरे में होने के कारण यहां व्यावसायिक दरों पर कर लगाया जाता है। इसी वजह से समान आकार के भूखंड पर जहां गीडा के उद्यमी करीब 24 हजार रुपये अनुरक्षण शुल्क देते हैं, वहीं इंडस्ट्रियल एस्टेट के उद्यमियों को करीब 1.09 लाख रुपये तक चुकाने पड़ते हैं।
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बुनियादी सुविधाएं समान, टैक्स अलग
उद्यमियों का कहना है कि तीनों औद्योगिक क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं लगभग समान हैं। इसके बावजूद केवल कर व्यवस्था अलग होने से इंडस्ट्रियल एस्टेट की इकाइयों पर साढ़े चार गुना तक अधिक वित्तीय बोझ पड़ रहा है। उनका कहना है कि सरकार उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करती है लेकिन अलग-अलग नियमों के कारण उद्योगों की लागत बढ़ रही है। इस मुद्दे को उद्योग बंधु और मंडलीय उद्योग बंधु की बैठकों में कई बार उठाया जा चुका है लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है।

एक नजर में अंतर
गीडा में अनुरक्षण शुल्क - 13 रुपये प्रति वर्गमीटर
यूपीसीडा में अनुरक्षण शुल्क - 15 रुपये प्रति वर्गमीटर
नगर निगम की दरें - गीडा और यूपीसीडा से चार गुना से अधिक
समान भूखंड पर गीडा में शुल्क - करीब 24 हजार रुपये
इंडस्ट्रियल एस्टेट में शुल्क - करीब 1.09 लाख रुपये

बोले व्यापारी
घर और उद्योग का रखरखाव कर एक जैसा नहीं हो सकता। नगर निगम क्षेत्र में स्थित बड़ी औद्योगिक इकाइयों पर हाउस टैक्स की तर्ज पर शुल्क लगाया जा रहा है, जिससे लागत बढ़ रही है। यदि शुल्क लिया भी जाए तो उसे गीडा और यूपीसीडा की दरों के आसपास रखा जाए। उत्पाद की लागत बढ़ने से उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे।
- आरएन सिंह, अध्यक्ष, चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज

उद्योगों से हाउस टैक्स के साथ वाटर टैक्स भी लिया जा रहा है, जबकि अधिकांश बड़ी फैक्टरियां अपना पानी बोरवेल से निकालती हैं और इसके लिए राज्य सरकार को अलग से शुल्क भी देती हैं। यानी एक ही पानी के लिए दो जगह भुगतान करना पड़ रहा है। यह व्यवस्था उद्योगों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाल रही है।
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- विष्णु अजीत सरिया, पूर्व अध्यक्ष, चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज
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