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DDU में यौन उत्पीड़न प्रकरण: पुलिस रिकॉर्ड में आने नहीं देते..अंदर ही दफन हो जाते हैं तमाम मामले

Sat, 10 Feb 2024 11:45 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : iStock
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डीडीयू में यौन शोषण का मामला गरमाने के बाद अब जांच के ढर्रे और मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं। इसके पीछे वजह भी है। जिले में जितने भी बड़े मामले खुले हैं, उनका ढर्रा यही रहा कि पुलिस उन्हें सुलझाने में जुटती है तो संबंधित विभाग उलझाने में।

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मेडिकल कॉलेज में पुलिस घुसी तो मरीज, एंबुलेंस और खून माफिया का गिरोह सामने आया। राजस्व विभाग में पुलिस घुसी तो भू-माफिया कमलेश यादव और दूसरे मामले सामने आ गए। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जैसे ही जांच संबंधित विभाग में पहुंचती है, वहीं पर पूरी तरह से ठप हो जाती है। कोई भी विभाग अपने दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई की अनुमति नहीं देता।

पुलिस के पत्र का एक ही जवाब आता है कि जांच कमेटी गठित कर दी गई है। फिर दिन, महीने और साल गुजर जाते हैं, लेकिन न तो वह जांच पूरी हो पाती है और न ही जांच रिपोर्ट आ पाती है। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर यूनिवर्सिटी और दूसरे विभागों में सामने आए हैं, जिसमें पुलिस ने जहां तक कार्रवाई की, वहीं तक हुई भी। एक भी कदम संबंधित विभाग वाले आगे नहीं बढ़ सके।
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केस एक

एलएलबी शिक्षकों पर लगा था आरोप
जून 2023 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के एलएलबी विभाग के दो शिक्षकों पर एक युवती ने शारीरिक शोषण का आरोप लगाया। सोशल मीडिया पर लाइव होकर युवती ने आरोप लगाया तो फिर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जांच कमेटी गठित कर दी, लेकिन आज तक रिपोर्ट सामने नहीं आ पाई। हालांकि, युवती भी पुलिस में नहीं गई और वक्त के साथ मामला ठंडा हो गया।

केस दो

शोध छात्रा ने लगाया था शोषण का आरोप
25 जुलाई 2023 को राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम जांच के लिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी आई थी, तब पता चला कि एक शोध छात्रा ने दो शिक्षकों पर शारीरिक शोषण का आरोप लगाया है। आयोग के सामने गोरखपुर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जांच कमेटी गठित करने और जल्द रिपोर्ट देने की बात कही। आश्वासन पर आयोग की टीम लौट गई, लेकिन जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी कि असल में हुआ क्या था?

 

केस तीन

एंबुलेंस, मरीज, खून माफिया के असल मददगार कौन
एक प्राइवेट अस्पताल में आठवीं पास के इलाज से मरीज की मौत हो गई। पुलिस ने जांच की तो मेडिकल कॉलेज तक मामला पहुंचा। फिर सामने आया कि यहां पर एंबुलेंस, मरीज और खून माफिया सक्रिय हैं। मरीज को अंदर से सामान की तरह प्राइवेट नर्सिंग होम को बेचा जा रहा है। प्राइवेट एंबुलेंस से उन्हें पहुंचाया जाता है। फिर आया कि मजदूरों के खून को मेडिकल कॉलेज में निकालकर बेचा जाता है। बाहर के सभी जेल गए, लेकिन जांच जैसे ही मेडिकल में पहुंची, मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कमेटी गठित कर दी जिसकी रिपोर्ट आज तक नहीं आ सकी।

केस चार

मेडिकल आईसीयू में आग का जिम्मेदार कौन, पता नहीं चला
26 जुलाई को मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन आईसीयू में आग लग गई थी। मरीजों को जैसे-तैसे बचाया गया था। आग की शुरुआती वजह शाॅर्ट सर्किट बताई गई और फिर जांच के लिए एक कमेटी गठित कर दी गई। कमेटी ने जांच शुरू की तब पता चला कि मेडिकल कॉलेज में कोई विद्युत अभियंता ही नहीं है। फिर डीएम को पत्र लिखा गया और जांच कमेटी आज तक जांच ही कर रही है, लेकिन यह नहीं बता पाई कि आग के लिए असल जिम्मेदार कौन था? पूरे मामले में कमेटी ने जांच रिपोर्ट की जगह सुझाव देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
 

केस पांच

नहीं आई जांच रिपोर्ट तो पुलिस ने भेज दिया चार्जशीट
देवरिया के मदनपुर निवासी शैला देवी के परिजनों से मारपीट हुई थी। मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद एसएसपी के निर्देश पर पुलिस ने केस दर्ज कर लिया। पुलिस ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन को पत्र लिखकर आरोपी डॉक्टरों का नाम मांगा। एक बार फिर पहले की तरह ही जांच कमेटी गठित कर दी गई, लेकिन दो महीने बाद भी कमेटी ने पुलिस को आरोपी डॉक्टर का नाम नहीं बताया। पुलिस ने खुद जांच की और फिर आरोपी डॉक्टरों पर चार्जशीट दाखिल कर दिया था।



 
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शिकायत पर ही पुलिस कर सकती है जांच
वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णा नंद तिवारी ने कहा कि पुलिस के पास जब शिकायत आती है, तब ही वह जांच कर सकती है। इस वजह से अगर वास्तव में किसी को लगता है कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है तो उसे अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इसके बाद ही पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है और मामला कोर्ट में जाने पर आरोपी को सजा होती है। यह एक पूरी प्रक्रिया है, इस वजह से जिसे भी न्याय चाहिए, उसे आगे आना ही होगा।

शिकायत पर ही दर्ज होता है केस
रिटायर्ड पुलिस अधिकारी शिवपूजन ने बताया कि पुलिस की कार्रवाई की एक प्रक्रिया होती है। जब पुलिस को कोई शिकायत मिलती है तो उस पर केस दर्ज कर जांच करती है और फिर साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करती है। मामला जब किसी अन्य विभाग का होता है तो पुलिस सहयोग मांगती है क्योंकि साक्ष्य वहीं दे सकता है, जिस विभाग का मामला हो। पुलिस पूछताछ के आधार पर संदेह ही जाहिर कर सकती है। अगर ऐसे में मदद नहीं मिलती है तो यह सही है कि पुलिस के सामने जितने साक्ष्य होते हैं, उतने पर ही कार्रवाई कर देती है।

 
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