कला जब जुनून बन जाती है तो वह न केवल कलाकार के जीवन को बदल देती है बल्कि दूसरों के लिए भी आजीविका का साधन बन जाती है। पादरीबाजार की रहने वाली मीना मल्ल ने मधुबनी पेंटिंग को इसी दिशा में आगे बढ़ाते हुए उसे आत्मनिर्भरता का माध्यम बना दिया है। उनका कहना है कि लोक कला को सहेजने से लोक समृद्धि आती है।
मीना मल्ल ने वर्ष 2012 में मधुबनी कला की बारीकियों को सीखा और लंबे समय तक इसे संवारने में जुटी रहीं। वर्ष 2024 से उन्होंने अपने गृह जनपद गोरखपुर में रहकर इस कला को व्यावसायिक रूप देते हुए एक सफल उद्यम के रूप में स्थापित किया है।
टीम का हिस्सा बनीं 10 से अधिक महिलाएं
मीना की टीम में 10 से 12 महिलाएं काम कर रही हैं। ये महिलाएं मिलकर पारंपरिक मधुबनी कला को आधुनिक उत्पादों में ढाल रही हैं। उनकी टीम साड़ी, दुपट्टे, ट्रेंडी पर्स, बैग्स, कोस्टर्स, लकड़ी के सजावटी आइटम और वॉल आर्ट जैसे आकर्षक उत्पाद तैयार कर रही है।
शौक से पहले परंपरा का संरक्षण फिर आजीविका का साधन
मीना का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य केवल कला को बढ़ावा देना नहीं बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी है। उनके अनुसार इस काम ने कई स्थानीय महिलाओं को घर बैठे रोजगार का अवसर दिया है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें पेंटिंग का शौक था, लेकिन मधुबनी कला से उनका वास्तविक जुड़ाव बिहार में रहने के दौरान हुआ, जिसने उनके शौक को जुनून और फिर व्यवसाय में बदल दिया।