फर्जी शस्त्र लाइसेंस प्रकरण में प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने गोरखपुर शहर के खोराबार के एक सेवानिवृत्त शिक्षक, आबकारी सिपाही समेत जिन 10 लोगों को छह अक्तूबर 2019 को जेल भेजा था, वे सब अब कानूनी रूप से बेगुनाह हो गए हैं। इस मामले में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट (एफआर) रिपोर्ट लगा दी है। इससे सभी 10 बेगुनाह व उनके परिजन खुश हैं। अमर उजाला ने इस मामले को सबसे पहले और तेजी से उठाया था।
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जानकारी के मुताबिक, नवंबर में ही जिला प्रशासन को आरोपी बनाए गए सभी के शस्त्र से संबंधित मूल दस्तावेज मिल गए थे। लिहाजा, आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई थी। मगर केस में फाइनल रिपोर्ट नहीं लगाई गई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक से न्याय की गुहार लगाई गई थी।
दो दिन पहले ही रिटायर शिक्षक ने एसएसपी से मिलकर मुकदमे से निजात दिलाने की अपील की थी। पुलिस व प्रशासन ने वैसे तो जांच के बाद नवंबर 2019 में ही इनको बेगुनाह बता दिया गया था, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में केस अब भी चल रहा था।
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अब मामले में एफआर लगा दी गई है। सबका कहना है कि फर्जी मामले में अपराधी की तरह जेल भेजा गया था। इससे पद, प्रतिष्ठा सब चली गई। एक साल दौड़ने के बाद मिला न्याय मिला है। बेगुनाह होते हुए भी एक वर्ष से ज्यादा समय तक मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। अफसोस के साथ खुशी भी है।
सीओ कैंट सुमित शुक्ला ने बताया कि सभी दस लोगों के मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई है। अब किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी।
इनको भेजा गया था जेल
खोराबार कुईं बाजार निवासी विनोद कुमार, जर्दा गांव के भैंसहा टोला निवासी जगदीश शुक्ला, जंगलसिकरी निवासी मोहम्मद बिन कासिम , छपरा गांव निवासी रामहित यादव, मिर्जापुर निवासी राम आशीष, जंगल रामलखना निवासी विजय प्रताप सिंह, जंगल चौरी टोला शेख निवासी महताब आलम, रायगंज बाजार निवासी राम चन्द्र, नवां अव्वल निवासी राम नयन और राम निवास यादव निवासी जंगलचौरी।
अब एक दूसरे पर उठा रहे सवाल
आरोपियों को क्लीन चिट मिलने के बाद मामले में अब पुलिस और प्रशासन के बोल बदल गए हैं। दोनों एक-दूसरे पर ही सवाल उठा रहे। जिला प्रशासन का कहना है कि उनकी मजिस्ट्रेटी जांच पूरी होने के पहले ही पुलिस ने संबंधित लोगों को जेल भेज दिया था। वहीं, पुलिस का कहना है कि जिला प्रशासन की रिपोर्ट पर उन्होंने कार्रवाई की।
आबकारी सिपाही पर पहले कार्रवाई फिर बहाल किया गया लाइसेंस बहाल
आबकारी सिपाही विजय प्रताप सिंह के पास मौजूद रिवाल्वर और रॉयफल के लाइसेंस का मिलान कलेक्ट्रेट के मूल अभिलेखों से नहीं होने पर पुलिस ने उसे फर्जी मानकर छह अक्तूबर 2019 जेल भेजा था। बाद में जांच पड़ताल में दोनों असलहों के मूल दस्तावेजों की सत्यापित कॉपी मिलने पर उसे बहाल किया गया।
फर्जी शस्त्र लाइसेंस प्रकरण में फंसने के बाद एक शख्स डॉक्टर साहब से अपराधी हो गया। उसे क्लीनिक बंद करनी पड़ी। दूसरों को शिक्षा देने वाले एक शिक्षक को लोग घूरकर देखते थे तो वह बगले झांकने लगते थे। इन भुक्तभोगियों का सवाल है कि भले ही माथे से कलंक हट गया लेकिन गई इज्जत कौन लौटाएगा। इस प्रकरण में दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
नौकरी चली गई थी
भैंसहा के जगदीश शुक्ला ने बताया कि जिस नौकरी के लिए बंदूक लिया था वह चली गई थी। किसी तरह से गुजर बसर कर रहा था। लेकिन इस प्रकरण से गांव में पूरी इज्जत ही खराब हो गई थी।
मुश्किल से कर सका लोगों का सामना
आबकारी सिपाही विजय प्रताप सिंह ने बताया कि फर्जी शस्त्र लाइसेंस प्रकरण फंसते ही विभागीय कार्रवाई हो गई और नौकरी गंवानी पड़ी। इस दौरान लोगों का सामना कैसे किया, बयां नहीं कर सकता हूं।
कार्रवाई होनी चाहिए
मिर्जापुर के रामअशीष निषाद ने बताया कि इस मामले में जिन लोगों ने हमें गुनाहगार बताया उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। हम लोगों की तो पूरी इज्जत ही चली गई। किस-किस को बताएंगे कि बेगुनाह हैं।
गुनाहगारों को मिले सख्त सजा
चंवरी के रामनिवास ने बताया कि उस समय ऐसा लग रहा था कि हम लोग वास्तव में कोई बड़े अपराधी हैं। मिन्नत करते रहे मगर किसी ने नहीं सुना, अब सच सामने आ गया है तो गुनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
बंद करनी पड़ी थी क्लीनिक
चंवरी के डॉ. महताब अहमद ने बताया कि इस मामले में फंसने के बाद सब इस तरह से देखने थे जैसे कोई अपराधी हूं। मुझे अपनी क्लीनिक तक बंद करनी पड़ी थी। आज भी वह दिन नहीं भूलता।
न्याय के लिए की जद्दोजहद
जंगल सिकरी के मोहम्मद विन कासिम ने बताया कि जिस तरह से जेल भेजा गया था वह दिन आज भी नहीं भूलता है। पूरी तरह से अपराधी बना दिया गया था। किस तरह से न्याय मिला हम ही लोग जानते हैं।
नोवा के रामनयन ने बताया कि सम्मान से एक शिक्षक की जिंदगी गुजर रहा था। मगर इस तरह से व्यवहार किया गया कि जैसे कोई अपराधी हूं। पुलिस ने एक शिक्षक से उसका सम्मान छीन लिया था।
दौड़भाग के बाद मिला न्याय
कुईं बाजार के विनोद कुमार ने बताया कि न्याय के लिए बहुत दौड़ लगानी पड़ी। बेगुनाह होने के बावजूद भी कोई ठीक से बात नहीं करता था। अब न्याय मिला है, तो मन को तसल्ली हुई है।
इंसाफ के लिए लड़ना पड़ा
रामलखना के रामचंदर ने बताया कि हम लोग तो जानते ही थे कि लाइसेंस कानून का पूरी तरह से पालन करते हुए लिया गया है लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं था। एक बारगी यह भी लगा कि सही में हम लोग ठग तो नहीं लिए गए।