उद्योगों के लिए सरकार कोई बेलआउट पैकेज नहीं लाती, तो गीडा में बहुत सारे उद्योगों के शटर हमेशा के लिए डाउन हो जाएंगे। यह मानना है शहर के उद्योगपतियों का। उनका कहना है कि लॉकडाउन पीरियड खत्म होने के बाद के उद्योगों की हालत बहुत ही खराब होने वाली है। मांग और आपूर्ति के बीच सामंजस्य बिठा पाना उद्योगों के लिए कठिन साबित होगा।
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लॉकडाउन की वजह से उद्योग बंद हैं। उत्पादन ठप है। फैक्ट्रियों के सभी कर्मचारी और वर्कर अपने-अपने घर चले गए हैं। जो स्थिति है, उसके अनुसार आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी फैक्ट्रियों में अभी एक पखवाड़ा (14 अप्रैल) और उत्पादन करीब-करीब ठप रहेगा।
हालांकि प्रदेश सरकार ने फैक्ट्रियों में काम शुरू करने की अनुमति देते हुए फैक्ट्री मालिकों से आवेदन मांगा है, लेकिन जिस ढंग से लोगों के घर से निकलने, आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अन्य चीजों से लदे ट्रक और गाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगी हुई है, न तो उद्योगों का कच्चा माल मिलेगा और न ही नया माल तैयार हो पाएगा।
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नतीजा, जब यह लॉकडाउन खत्म होगा तो उद्योगों के सामने बहुत बड़ी चुनौती आने वाली है। गीडा के उद्योगपति आने वाले हालात से बहुत घबराए हुए हैं। उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि इस लॉकडाउन की वजह से औद्योगिक विकास गति पूरी तरह से पटरी से उतरी हुई होगी। फिलहाल स्थिति में कुछ सुधार होने में तो तीन से चार महीने लगेंगे, लेकिन बेहतर स्थिति के लिए कम से कम एक साल लगेंगे।
डिमांड पूरा करने में लग जाएंगे छह महीने
उद्योगपतियों के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। सभी कर्मचारियों को वेतन देना है। उत्पादन पूरी तरह से ठप है। सरकार ने फैक्ट्री शुरू करने की अनुमति दी है, लेकिन कच्चे माल की कमी है। जितना माल है उससे कुछ ही दिन उत्पादन संभव है। अधिकांश वर्कर घर जा चुके हैं। ऐसे में उत्पादन शुरू करना भी कठिन है।
लॉकडाउन के बाद आने वाला समय बहुत चुनौतीपूर्ण होगा। जो डिमांड होगी, उसको पूरा करने में छह महीने लग जाएंगे। यह सब आर्थिक मंदी के संकेत हैं। फिलहाल की स्थिति को रिकवर करने में तीन से चार महीने का समय लग सकता है, लेकिन उद्योगों को पटरी पर आने में कम से कम एक से डेढ़ साल लग जाएंगे। -मयंक अग्रवाल, सीआईओ, गैलेंट इस्पात
सरकार को बेलआउट पैकेज की घोषणा करनी चाहिए
किसी भी फैक्ट्री की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से उसके उत्पादन और खपत पर निर्भर करती है। यह अनुपात बेहतर है तो फैक्ट्री मालिक अपने सभी कर्मियों का वेतन भी बेहतर ढंग से दे पाते हैं। लॉकडाउन में आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अन्य उत्पाद तैयार करने वाली फैक्ट्रियां पूरी तरह से बंद हैं, उनके मालिकों के सामने अपने कर्मियों का वेतन देने पर भी संकट है।
सरकार को बेलआउट पैकेज की घोषणा करनी चाहिए। सभी कर्मचारियों का वेतन सरकार को वहन करना चाहिए। इसकेअलावा सरकार को यह प्रावधान भी करना चाहिए कि फैक्ट्रियों द्वारा लिए गए लोन का ब्याज पूरी तरह से माफ करे। अगर ऐसा नहीं होता है तो इस लॉकडाउन के बाद एमएसएमई (लघु, कुटीर और मध्यम) श्रेणी के बहुत सारे उद्योगों में ताला लग जाएगा। -आरएन सिंह, अध्यक्ष, वेल्ड इंडिया
पिछले कुछ महीने से देश की अर्थव्यवस्था अघोषित आर्थिक मंदी से जूझ रही थी। अब लॉकडाउन से उद्योग भी मंदी की ओर बढ़ रहे हैं। फैक्ट्री के करीब 95 प्रतिशत वर्कर घर लौट गए हैं। रॉ मेटेरियल की आवक पूरी तरह से ठप है। उत्पादन भी ठप है। जब लॉकडाउन खत्म होगा तो विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़ेगी, लेकिन फैक्ट्रियां उस अनुपात में उत्पादन करने में सक्षम नहीं होंगी। मांग और आपूर्ति की कड़ी टूट गई है, इसे बनाने में समय लगेगा। लिहाजा उद्योगों के सामने अपने को टिकाए रखना बहुत बड़ी चुनौती होगी।
दूसरी जो सबसे बड़ी चुनौती आने वाली है, वह बैंकों को लौटाए जाने वाला कर्ज और उसका ब्याज। उत्पादन नहीं होगा तो उद्यमी लोन की किस्त कहां से चुकाएंगे। अगर यह दौर दो-तीन महीना जारी रहा है तो इससे उबरने में उद्योगों को वर्षों लग जाएंगे। उद्योगों को बचाने के लिए सरकार को आगे आना चाहिए। -ओमप्रकाश जालान, प्रबंध निदेशक जालान कॉन कास्ट
लॉकडाउन के बाद भी होगी बड़ी दिक्कत
गोरखपुर में सिर्फ वही उद्योग चल रहे हैं, जो आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। मैं भी अपनी फैक्ट्री शुरू कर सकता हूं, लेकिन मजदूर नहीं हैं। अधिकांश अपने गांव लौट गए। जब लॉकडाउन खत्म होगा, तभी व्यवस्था पटरी पर आएगी। सबसे ज्यादा संकट छोटे और मझोले श्रेणी के उद्योगों को झेलनी पड़ेगी।
अधिकांश उद्योग बैंकों से कर्ज लेकर चलाए जाते हैं। बंदी के दौरान काम तो पूरी तरह से बंद है, लेकिन बैंकों का ब्याज तो बढ़ ही रहा है। बिजली बिल जमा करने की चुनौती अलग से खड़ी रहेगी। फैक्ट्री नहीं चलने के बावजूद बिल का भुगतान करना है। सरकार को इन सारे पहलुओं पर ध्यान देते हुए उद्योगों को राहत पैकेज देने के बारे में सोचना चाहिए। -विष्णु अजीत सरिया, अध्यक्ष, चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज