संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए राष्ट्रीय रक्षा अकादमी पुणे के सेवानिवृत्त आचार्य प्रो राजेंद्र भारती ने कहा कि सेना का अग्निपथ वह मार्ग है जो कौशल विकास और अनुशासन से दक्ष कर युवाओं को उनके सुनहरे और बहुआयामी भविष्य की ओर उन्मुख करेगा।
उन्होंने अग्निपथ योजना की विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि अग्निपथ में चार साल की सेवा के बाद युवाओं के पास सेना के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी समायोजित होने का भरपूर अवसर होगा। 25 फीसद अग्निवीर योग्यता के अनुसार सेना में ही भर्ती कर लिए जाएंगे। जो 75 फीसद शेष रह जाएंगे उन्हें कंबाइंड आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (सीएपीएफ) में भर्ती के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण व आयु सीमा में छूट मिलेगी।
इसके अलावा उन्हें डिफेंस पीएसयू, कोस्ट गार्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि राज्यों की पुलिस में भर्ती होने की वरीयता मिलेगी। टाटा और महिंद्रा जैसी कई कंपनियों ने भी अग्निवीरों को सेवायोजित करने की बात कही है। यदि कोई अग्निवीर सेवा के बाद खुद का कारोबार शुरू करना चाहेगा तो सेवा पूर्ण होने पर मिलने वाले 11.70 लाख रुपये व बैंक लोन की मदद से वह बहुत कुछ कर सकेगा।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सिद्धगुफा, सवाई आगरा से पधारे ब्रह्मचारी दास लाल ने कहा कि अग्निपथ वास्तविक रुप से जीवन का पथ है। यह राष्ट्र धर्म का पथ है, जीवन के लक्ष्य को साधने का भी पथ है। जीवन की सफलता का पथ है। भारत माता की सेवा साधना का पथ है। मानव जीवन की मुक्ति का पथ है और युवाओं को राष्ट्रीय कर्तव्यों का बोध कराने का पथ है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष प्रो उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हमारे देश की विविधता ही हमारी ताकत रही है। अग्निपथ अखिल भारतीय स्तर की भर्ती की योजना है और इसके माध्यम से हम अपनी विविधता की ताकत का सही इस्तेमाल कर पाएंगे।
संगोष्ठी का शुभारंभ ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के चित्रों पर पुष्पांजलि से हुआ। वैदिक मंगलाचरण डॉ रंगनाथ त्रिपाठी व गोरक्ष अष्टक का पाठ गौरव और आदित्य पांडेय ने किया। इस अवसर पर महंत शिवनाथ, महंत गंगा दास, राममिलन दास, महंत राम नाथ, महंत राजू दास, महंत मिथलेश नाथ, महंत रविंद्रदास, महंत पंचाननपुरी, गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ प्रदीप कुमार राव समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।