तनाव से एक व्यक्ति इस कदर टूट गया कि उसने खुद को मृत ही मान लिया था। मरीज को मानसिक बीमारी थी। डॉक्टरों के मुताबिक उसे सामान्य करने के लिए लंबा इलाज किया गया।
बात-बात में हो रहे तनाव को हल्के में न लें। इससे दिमाग को खुशी देने वाले हार्मोंस सेरोटोनिन और डोपामिन की कमी हो जाती है। करिअर की चिंता या रोजमर्रा की जिंदगी में मिल रहे तनाव से लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही तो इंसान डिप्रेशन विद साइकोसिस जैसी गंभीर मानसिक बीमारी की चपेट में आ सकता है।
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एम्स में हाल ही में ऐसा एक मामला आया था, जिसमें नौकरी जाने के बाद उपजे आर्थिक और पारिवारिक तनाव से एक व्यक्ति इस कदर टूट गया कि खुद को मृत ही मान लिया था। बिस्तर पर बेसुध पड़ा रहकर कहता था-मैं लाश हूं...। डॉक्टरों के मुताबिक उसे सामान्य करने के लिए लंबा इलाज किया गया।
अब उसकी स्थिति बेहतर है। डॉक्टर बताते हैं कि सेरोटोनिन और डोपामिन को खुशी का हार्मोन कहा जाता है। जब भी आप अच्छे माहौल में रहते हैं, हंसते हैं या अच्छा संगीत सुनते हैं तो ये हार्मोंन अधिक मात्रा में स्रावित होते हैं, वहीं जब व्यक्ति तनाव में रहता है तो इन हार्मोंस का उत्सर्जन कम हो जाता है।
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इसकी कमी से मरीज उदास, चिंतित और थका हुआ रहता है। लंबे समय तक इसका प्रभाव बने रहने से भूख नहीं लगना, भविष्य की चिंता को लेकर दु:खी रहना, असहाय महसूस करना आदि लक्षण दिखने लगते हैं। पिछले दिनों एम्स के मानसिक रोग विभाग में एक ऐसा मरीज आया, जो स्ट्रेचर पर लेटा था और कोई हरकत नहीं कर रहा था।
उसकी पत्नी ने बताया कि कुछ दिन पहले मरीज ने खुद को मरा मान लिया। उसे लगता है कि यहां बस उसका शरीर पड़ा है, उसे किसी दवा की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके शरीर के अंग सड़ चुके हैं। इसी सोच के साथ मरीज सिर्फ बिस्तर पर लेटा रहता था।
45 वर्षीय इस शख्स के जिंदा रहते हुए उसके मुंह से ऐसी बातें सुनकर पत्नी बेहद परेशान थी। पति के बेहतर इलाज के लिए कई अस्पताल पहुंची, लेकिन बीमारी का पता नहीं लगने पर कोई सुधार नहीं हो रहा था। एम्स में डॉक्टरों ने परिवार की काउंसिलिंग और मरीज की जांच-पड़ताल की तो पता लगा कि यह डिप्रेशन विद साइकोसिस नाम की गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रसित है।
ईसीटी के छह डोज से सुधरी स्थिति
सारे उपाय करने के बाद भी हालत में सुधार नहीं होने पर डॉक्टरों ने इसे इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी) की एक डोज दी। इसके बाद उसे पांच और डोज दी गईं। इससे मरीज के दिमाग में हलचल शुरू हुई और हार्मोंस का स्राव शुरू होने पर उसका भ्रम दूर होने लगा। जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह मृतक नहीं, जिंदा है तो उसकी सारी गतिविधियां फिर से सामान्य होना शुरू हुईं।
अब मरीज की हालत में तेजी से सुधार आ रहा है। डॉक्टरों ने बताया कि ईसीटी थेरेपी उन मरीजों को दी जाती है, जो काउंसिलिंग और दवाओं से ठीक नहीं हो पाते हैं। इस थेरेपी में मस्तिष्क में हल्की विद्युत ऊर्जा का प्रवाह देकर एक कृत्रिम दौरा उत्पन्न किया जाता है। इससे मस्तिष्क की रासायनिक गतिविधियां पुनः संतुलित हो जाती है, जिससे मानसिक स्थिति में सुधार आता है।
तनाव की पहचान में घर की भूमिका महत्वपूर्ण
खुद को मृतक समझ रहे मरीज के घरवालों ने बताया कि मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया के सामने चार बच्चों को पढ़ाई और उनके भविष्य की चिंता तनाव का कारण बन गया। पत्नी ने बताया कि तीन साल पहले नौकरी जाने के बाद पति ने कई जगह पार्टटाइम काम किया। जो काम नहीं आता था, उसे भी सीखा, लेकिन घर की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थीं।
वे अकेले रहते थे, रातभर नींद नहीं आती थी, किसी से बात नहीं करते थे। शुरू में तो इसे नौकरी का सामान्य दबाव मानकर ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वे खुद को मरा मानकर बिस्तर पर ही लेट गए। नित्यक्रिया के लिए भी उठते ही नहीं थे।
लगता था कि वे इस दुनिया में ही नहीं हैं। डॉक्टरों ने बताया कि ऐसे मामलों में परिवार के लोग फर्स्ट डोर कीपर की भूमिका निभाते हैं। इस तरह के तनाव की शुरुआत होते ही परिवार को तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। 20 से 30 साल के लोगों पर ऐसे लक्षण ज्यादा देखे जा रहे हैं।
मरीज की स्थिति काफी गंभीर थी, लेकिन इलाज के बाद अब वह स्वस्थ है। ईसीटी से 90 फीसदी मरीजों को आराम मिला है। इसमें विद्युतीय तरंगों का उपयोग कर मस्तिष्क की नर्व्स को क्रियाशील किया जाता है। यह उन केसों में ज्यादा उपयोगी है, जो मरीज दवा नहीं लेना चाहते। ऐसे मरीजों को ठीक करने में ईसीटी थेरेपी काफी कारगर साबित हुई है। यह थेरेपी एम्स में कुछ महीनों पहले ही शुरू हुई है। ऐसे सात गंभीर मरीजों को इससे ठीक किया जा चुका है।-डॉ. मनोज पृथ्वीराज, प्रभारी, विभागाध्यक्ष