स्कूली बच्चों को ढोने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा को परमिट नहीं मिलता है। बावजूद, इसके जिम्मेदारों की आंखों के सामने स्कूलों के बाहर ऑटो और ई-रिक्शा की लंबी कतार लगी रहती है। चालक मनमाने तरीके से बच्चों इनमें बैठाते हैं, लेकिन उन्हें रोकने-टोकने वाला तक कोई नहीं होता है।
हर साल करना होता है फिटनेस
पंजीकृत स्कूल वाहनों की हर साल फिटनेस की जांच करानी होती है। जांच में 20 से 30 फीसदी वाहन फिटनेस जांच में फेल हो जाते हैं। स्कूल बस संचालन में वाहनों में कैमरा, फायर सेफ्टी उपकरण, वाहन में मेडिकल किट, बस परमिट, प्रदूषण वैधता प्रमाणपत्र, वाहन में सीट बेल्ट, साइड की तीन पाइप, जिससे बच्चा सिर बाहर नहीं निकाल पाए की व्यवस्था जरूरी है। इसके अलावा बस के पीछे स्कूल के नाम और नंबर लिखे होने चाहिए।
एआरटीओ प्रशासन अरुण कुमार ने कहा कि स्कूली वाहनों का फिटनेस हर साल कराना अनिवार्य होता है। फिटनेस नहीं कराने वाले वाहनों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है।
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एचपी स्कूल के पास वैन में कुछ इस तरह भरे दिखे बच्चे।
- फोटो : अमर उजाला।
कुशीनगर के दुदही कस्बे के पास 26 अप्रैल 2018 को स्कूली वाहन की पैसेंजर ट्रेन की चपेट में आने से 13 बच्चों की मौत हो गई थी, जबकि चालक व दो बच्चे घायल हुए थे। इस हादसे के बाद रेल मंत्रालय ने अनमैंड रेलवे क्रॉसिंग बंद करने और प्रदेश सरकार ने बिना मान्यता के स्कूल व बिना परमिट के स्कूल वाहन संचालन पर सख्ती से रोक लगाने का आदेश दिया था।
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पांच साल पहले हुए इस हादसे ने प्रदेश व केंद्र सरकार को भी झकझोर दिया था। मुख्यमंत्री ने मौके पर पहुंचकर मामले की जानकारी ली थी। उसी दिन प्रदेश में बिना मान्यता वाले स्कूलों व बिना परमिट वाले बसों पर सख्ती के आदेश दिए गए। अगले सप्ताह तक प्रदेश भर में खूब धरपकड़ हुई। लेकिन उसके बाद सब भूल गए। अब हर दिन टैंपो से स्कूली बच्चे ढोए जा रहे हैं। बिना परमिट की बसें दौड़ रही हैं। लेकिन, इसकी जांच व कार्रवाई के लिए न तो आरटीओ और न ही बीएसए की तरफ से कोई कार्रवाई हो रही है।