केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि भारत की संस्कृति ऐसी है, जिसने अपने बुनियादों से रिश्ता खत्म नहीं किया। ज्ञान और परंपरा हमारी संस्कृति की विरासत है। ज्ञान की प्रगति ही जीवन का लक्ष्य है। विविधता के अंदर एकता नजर आए, यही ज्ञान का मकसद होना चाहिए।
केरल के राजयपाल मंगलवार को गोरखपुर में थे, वे स्वतंत्र संग्राम सेनानी स्व. नागेंद्र नाथ सिंह की पुण्यतिथि के अवसर पर गोरखपुर क्लब में आयोजित विचार गोष्ठी व सम्मान समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। 'विविधता भारत की राष्ट्रीय एकता को दृढ़ करने का स्रोत है' विषयक संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि भारत में विविधता में एकता को स्वीकार ही नहीं किया गया, बल्कि सम्मान भी दिया गया है।
यह हमारी परंपरा है, इसकी शुरुआत वेदों से हुई है। राज्यपाल ने कहा कि दुनिया में पांच बड़ी संस्कृतियों को मान्यता दी गई है, बाकी सभी देश उन्हीं से जुड़े हुए हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ईरान वैभव और शानो शौकत, रोम की सुंदरता, चीन का कौशल, तुर्की की बहादुरी और भारत, ज्ञान व प्रजा के संवर्धन के लिए जानी जाती है।
कहा कि हमने अपनी संस्कृति के मूल आधार को कभी विचलित नहीं होने दिया। यही भारत के संस्कृति की खासियत है। उन्होंने कहा कि ऋषियों ने वैदिक काल में ही तय कर दिया था कि एकता के लिए विविधता को स्वीकार करना जरूरी है। मतभेदों को मन का भेद नहीं बनाना चाहिए। विविधता, एकता को मजबूत करने का जरिया हो सकता है।
पूर्व वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल ने कहा की स्वतंत्रा आंदोलन राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा स्रोत रहा है। जातीयता की विकृति राजनीती ने दिया। विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रदेश की बात करते हैं। राजनीति शासन को चलाने की विधा है जबकि विविधता भारत के लोगों की विधा है।