महात्मा भगवान बुद्ध के ननिहाल देवदह को पहचान दिलाने की जद्दोजहद अब रंग ला रही है। क्योंकि रविवार को संसद में पर्यटन के रूप में विकसित करने का मुद्दा सांसद पंकज चौधरी ने उठाया। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के सामने देवदह के ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया। देवदह, रामग्राम, कुंवरवर्ती स्तूप को विकसित कर पर्यटन से जोड़ने की मांग की। इसके अलावा सोहगीबरवां वन्य जीव प्रभाग को टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने की मांग की।
इतिहासकारों के मुताबिक महराजगंज में ही भगवान बुद्ध की ननिहाल देवदह है। नौतनवां तहसील के बनरसिया कला और बनरसिया खुर्द में यह स्थान है। 1978 में पुरातत्व विभाग ने यहां 88.8 एकड़ भूमि संरक्षित कर किसी भी प्रकार के निर्माण और खनन पर रोक लगा दी। टिले के नाम मात्र 1.04 एकड़ जमीन बची है। देवदह गौतम बुद्ध की मां महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा की जन्मस्थली है।
देवदह और राम ग्राम के बारे में विशेष जानकारी रखने वाले डॉ. परशुराम गुप्त बताया कि सम्राट हर्ष के शासन में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने बौद्ध स्थलों का भ्रमण किया था। वह देवदह भी आए। 1991 में पुरातत्विक सर्वेक्षण विभाग की पटना इकाई ने यहां खनन कराया। स्तूप को गुप्त काल से पहले का बताया गया। सांसद ने इस मसले में संसद में उठाया है जिससे उम्मीद है कि क्षेत्र का विकास तेजी से होगा।
देवदह की दूरी पांच योजन
पालि विवरणों में कपिलवस्तु से देवदह की दूरी पांच योजन बताई गई है। चीनी यात्री फाह्यान ने यात्रा विवरण में स्थानों की दूरियों का उल्लेख योजनों में किया है। कनिंघम की गणनानुसार फाह्यान का एक योजन 6.71 मील के बराबर था।
कपिलवस्तु से बर्डपुर, मोहाना, लोटन, कोल्हुई व एकसड़वा होते हुए लक्ष्मीपुर ब्लॉक स्थित बनरसिया (देवदह) की दूरी 53 किमी पूरब है। कपिलवस्तु से लुम्बिनी, केवटलिया, बेतकुइयां, महदेवा (नेपाल), जोगियाबारी व एकसड़वा होते हुए बनरसिया की दूरी भी इतनी ही है। ऐसे में दिशा और दूरी के आधार पर बनरसिया स्तूप देवदह साबित होता है।
यहां भगवान बुद्ध ने त्यागा था राजसी वस्त्र
भगवान बुद्ध से जुड़े देवदह, रामग्राम, कुंवरवर्ती स्तूप, पिप्पलिवन हैं। इनमें देवदह महत्वपूर्ण है। रामग्राम भी बौद्ध युगीन कोलिय जनपद की राजधानी थी, जहां भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी अस्थियों के आठवें भाग पर एक धातु स्तूप निर्मित किया गया। इसे चिह्नित नहीं किया जा सका है। तीसरा महत्वपूर्ण स्थल कुंवरवर्ती स्तूप है। यहां गृहत्याग के बाद भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्र को त्याग कर संयासी का वेश धारण किया था।
पर्यटन के विकसित करने की मांग
भाजपा सांसद पंकज चौधरी ने बताया कि सरकार से इन स्थलों का राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा सर्वेक्षण व उत्खनन कराकर इन स्थलों को चिन्हित कराकर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किए जाने की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल के पिछड़े जनपद में भगवान बुद्ध के ननिहाल देवदह उनके समाधि स्थल रामग्राम, बनरसिया, कन्हैया बाबा स्थान को राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा शीघ्र चिन्हित कराने का मुद्दा संसद में उठाया गया है। बौद्ध सर्किट से इन स्थलों को जोड़ने पर तेजी से विकास होगा।