साहित्यकार अजय सिंह ने कहा कि हमारे सामाजिक परिवेश में कई तरह की असमानताएं और असुरक्षा मौजूद हैं। साथ ही टीवी-मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ने एक रंगीन दुनिया सजा रखी है। बाल मन इससे बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहा है। परिवार का प्रशिक्षण बुनियादी तौर पर कमजोर हुआ है। ऐसे में कोई स्वप्न सरीखी दुनिया पाने के लिए भागना नितांत स्वाभाविक है, लेकिन बेहद खतरनाक भी, क्योंकि सब तरफ शिकारी बैठे हैं। परिवार और समाज का बुनियादी ढांचा ठीक करना होगा नहीं तो इस तरह की घटनाओं को रोक पाना बिल्कुल संभव नहीं होगा।
साहित्यकार देवेंद्र आर्य ने कहा कि हमारे समाज में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली परीक्षा पास करने तक सीमित होता जा रहा है। नाबालिग बच्चियों को बरगला कर उनका शोषण, उन्हें अंधेरी गलियों में छोड़ देना या फिर दिल्ली जैसी घटना रोज़ देश के हर इलाके में घट रही है। इसे केवल कानून व्यवस्था की कमज़ोरी का या टीनएज आक्रामकता का मामला मान कर नहीं सुलझाया जा सकता है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, कोई बदलाव नहीं होगा। हमारी नैतिकता का लगातार क्षरण हो रहा है। हम अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुविधाएं देने में जुटे हैं। मगर उनमें नैतिकता का विकास कैसे होगा, इसपर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। यह अत्यंत दुखद है।
साहित्यकार सतविंदर कौर ने कहा कि महिला सशक्तिकरण के इस दौर में एक लड़का किसी लड़की को सिर्फ इसलिए बर्बरता पूर्वक मार देता है क्योंकि वह लड़की उससे रिश्ता नहीं रखने का फैसला करती है। नाबालिग बच्चियों को बरगलाकर उनके साथ गलत करना या साक्षी के साथ हुई घटना पहली या हाल-फिलहाल की नहीं है। लंबे समय से यह सिलसिला चल रहा है। घटनाएं हो रही हैं मगर, इस दिशा में कोई गंभीरता से नहीं सोच रहा। हम आज भी अपने लड़कों को मानसिक रूप से इतना विकसित नहीं कर पाए हैं कि वह समझ सकें कि स्त्री का भी अपना एक अलग वजूद होता है। यह लड़कों को समय रहते समझाने का दायित्व मां-बाप का है।