उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को 1932 में चार माह व 1941 में एक माह का कारावास हुआ था। 19 सितंबर 1921 नेहरू की एक जनसभा जो कि गोरखपुर में होना निश्चित हुआ था, लेकिन इस बात की खबर अंग्रेजों को पता लग गई। जिसके बाद अंग्रेजों ने कार्यक्रम होने से पूर्व ही हाई अलर्ट जारी कर दिया। कार्यक्रम को निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए पांच वर्ष की इंदिरा गांधी को गोद में लेकर पैदल ही छिपते-छिपाते नेहरू जी शुक्ल के घर पहुंचे।
20 सितंबर को शुक्ल के घर पर ही जिला कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ। जिसमें रघुपति सहाय, फिराक गोरखपुरी को अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्य समाजी देवव्रत को महामंत्री और सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया गया। 21 सितंबर 1921 को नेहरू ने गांधीनगर में एक विशाल जनसभा की।
इस कार्यक्रम के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने विदेशी वस्तु की होली जलाई व अंग्रेज सरकार की नौकरी को छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। शुक्ल जी आजादी के ऐसे दीवाने थे जिन्होंने वर्ष 1922 से 1942 तक सारी संपत्ति बेचकर अपना सब कुछ दान कर दिया।