रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट (रेरा) में जीडीए समेत सिर्फ 45 फर्म पंजीकृत हैं, जबकि गोरखपुर जिले में कॉलोनियां 200 से अधिक बस रहीं हैं। नियमानुसार, 500 वर्ग मीटर से अधिक या आठ फ्लैट की सभी योजनाओं का रेरा में पंजीकरण जरूरी है। इसके उलट शहर और शहरी सीमा के चारों तरफ धड़ल्ले से प्लॉटिंग हो रही है, खेत-गड्ढे तक में कॉलोनी बसाई जा रहीं हैं।
आम आदमी प्लॉट या फ्लैट लेते वक्त ठगा न जाए और बिल्डर्स की जिम्मेदारी तय हो सके, इसी उद्देश्य से रेरा कानून लागू किया गया। जुलाई 2017 के बाद से सभी आवासीय, व्यावसायिक योजनाओं के लिए प्लाटिंग या अपार्टमेंट बनाने के लिए पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।
नियम है कि 500 वर्ग मीटर से अधिक जमीन या आठ फ्लैट से अधिक की कोई भी योजना संचालित करने के लिए रेरा में पंजीकरण कराना होगा। मगर, इन तीन सालों में महज 45 फर्म ने पंजीकरण कराया, जबकि दो सौ से अधिक कॉलोनियां या अपार्टमेंट बनकर तैयार हो गए या निर्माण की प्रक्रिया में हैं।
45 में से नौ पंजीकरण जीडीए के, बाकी में भी कुछ ही फर्म के ज्यादा
खुद गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) सितंबर 2020 में सर्वे कर 153 अवैध कॉलोनियां चिह्नित कर चुका है। इनके खिलाफ कार्रवाई के लिए रेरा को पत्र भी लिखा गया है। ये तो वे कॉलोनियां हैं, जो प्राधिकरण सीमा के भीतर आती हैं। प्राधिकरण की सीमा के बाहर भी तेजी से अवैध कॉलोनियां बसाईं जा रहीं हैं।
देवरिया बाईपास पर सिक्टौर से खोराबार मोड़ तक कई अवैध कारोबारियों ने मुख्य सड़क से 10 से 20 फीट नीचे तक गड्ढों में प्लाटिंग कर रखी हैं। इसी तरह गोरखपुर से वाराणसी फोरलेन पर शहर से करीब 20 किलोमीटर आगे सेवई बाजार तक अवैध प्लाटिंग की जा रही है। इनमें से ज्यादातर का न तो ले-आउट स्वीकृत है न ही रेरा में कोई रजिस्ट्रेशन ही। यहीं नहीं, ज्यादातर जमीनें भी कृषि की हैं, जिन्हें आवासीय बताकर बेचा जा रहा है। कुछ ने ही जमीन का लैंडयूज कृषि से आवासीय में परिवर्तित कराया है, क्योंकि यह भी एक कठिन प्रक्रिया है।
रेरा में पंजीकरण अनिवार्य किए जाने के करीब साढ़े तीन साल की अवधि के बीच जिन 45 परियोजनाओं के पंजीकरण हुए हैं, उनमें भी नौ परियोजनाएं जीडीए की ही हैं। इनमें लोहिया के तीनों फेज, वसुंधरा के दो फेज, लेक व्यू, पत्रकारपुरम और पत्रकारपुरम विस्तार के अलावा राप्तीनगर में निमार्णाधीन पीएम आवास योजना शामिल है। बाकी के जो पंजीकरण हैं, उनमें भी शहर के कुछ नामी और नियम कायदों की अहमियत समझने वालों के ही दो से तीन-तीन परियोजनाएं हैं।
सितंबर 2019 से अब तक सिर्फ आठ परियोजनाओं का पंजीकरण
जुलाई 2017 से सितंबर 2019 तक 37 तो उसके बाद से लेकर अब तक महज आठ परियोजनाओं का ही रेरा में पंजीकरण हुआ। कोरोना काल में करीब आठ महीने तक काम प्रभावित होने की वजह से संख्या कम रही।
सदन तक में गूंज चुका है अवैध कॉलोनियों का मुद्दा
गोरखपुर शहर के भीतर एवं बाहर तेजी से बस रही अवैध कॉलोनियों का मुद्दा कई बार सदन में भी उठ चुका है। साल भर पहले नगर विधायक डॉ राधा मोहन दास अग्रवाल भी इस मुद्दे को सदन में उठाते हुए कहा था कि बिना रेरा में रजिस्ट्रेशन और जीडीए से ले-आउट स्वीकृत कराए ही अवैध कॉलोनियां बना दी जा रही हैं। लोग वहां प्लॉट ले लेते हैं और जब अवैध कॉलोनियों की वजह से वहां मूलभूत सुविधाएं जैसे सड़क, बिजली-पानी नहीं मिलती तो जनप्रतिनिधियों के पास दौड़ते हैं।
इन कॉलोनियों के बसने में प्राधिकरण के अफसर भी जिम्मेदार हैं। मानचित्र की अनदेखी का छोटा सा निर्माण कराने वाले आम आदमी पर तो प्राधिकरण के अवर अभियंताओं की नजर तत्काल पड़ जाती है और तेजी से पनप रही बड़ी-बड़ी अवैध कॉलोनियों तक उनकी नजर नहीं जाती।
परियोजना की लागत का 10 फीसद जुर्माना लगा सकता है रेरा
जीडीए अफसरों के मुताबिक अवैध कालोनियां बसाने वाले कालोनाइजर पर रेरा परियोजना की कुल लागत (जमीन की कीमत व विकास पर खर्च) का 10 फीसद जुर्माना लगा सकता है। इसके अतिरिक्त तीन साल की जेल भी हो सकती है।
जीडीए सचिव राम सिंह गौतम ने बताया कि जुलाई 2017 के बाद किसी भी परियोजना को शुरू करने के लिए रियल एस्टेट के हर कारोबारी का रेरा में पंजीकरण जरूरी है। बिना पंजीकरण के संचालित परियोजना अवैध है। इसी तरह प्राधिकरण से बिना ले-आउट स्वीकृत कराए बन रही कॉलोनियां भी अवैध हैं। जीडीए अपनी सभी परियोजनाओं का रेरा में पंजीकरण के बाद ही निर्माण कार्य शुरू कराता है।