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सुई से होगा हेयर ट्रांसप्लांट: AIIMS गोरखपुर ने खोजी सस्ती तकनीक, कम खर्च में होगा हेयर और स्किन का इलाज

Thu, 16 Jul 2026 04:55 PM IST
Rohit Singh अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर

सार

विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील गुप्ता ने बताया कि तीन हजार ग्राफ्ट लगाने के लिए करीब 1500 से 2000 इम्प्लांटर की जरूरत पड़ सकती है। चोई पेन इम्प्लांटर की कीमत करीब 500 से 600 रुपये होती है। वहीं, नई तकनीक में इस्तेमाल होने वाली सुई की कीमत केवल तीन से चार रुपये है। इससे इलाज का खर्च काफी कम हो जाएगा। 
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गोरखपुर एम्स - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बालों के झड़ने और गंजेपन से परेशान लोगों के लिए राहत की खबर है। गोरखपुर एम्स के डॉक्टरों ने हेयर ट्रांसप्लांट को आसान और सस्ता बनाने की नई तकनीक विकसित की है। इस नई खोज में महंगे हेयर इम्प्लांटर की जगह सामान्य सुई को नया आकार देकर इस्तेमाल किया गया है। इससे हेयर ट्रांसप्लांट की लागत सौ गुना से अधिक कम हो सकती है। एम्स की यह तकनीक प्रतिष्ठित इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित हुई है।

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के चर्म रोग विभाग के विशेषज्ञों ने 18जी (गेज) और 20जी सुई को विशेष तरीके से मोड़कर नया इम्प्लांटर तैयार किया है। सामान्य तौर पर हेयर ट्रांसप्लांट में चोई पेन इम्प्लांटर का इस्तेमाल होता है जिसकी कीमत काफी अधिक होती है। नई तकनीक में सुई से ही बालों की जड़ लगाने की प्रक्रिया पूरी की जा सकेगी।

विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील गुप्ता ने बताया कि तीन हजार ग्राफ्ट लगाने के लिए करीब 1500 से 2000 इम्प्लांटर की जरूरत पड़ सकती है। चोई पेन इम्प्लांटर की कीमत करीब 500 से 600 रुपये होती है। वहीं, नई तकनीक में इस्तेमाल होने वाली सुई की कीमत केवल तीन से चार रुपये है। इससे इलाज का खर्च काफी कम हो जाएगा।

उन्होंने बताया कि हेयर ट्रांसप्लांट में बालों की जड़ों यानी ग्राफ्ट को शरीर से बाहर कम समय तक रखना जरूरी होता है। नई तकनीक में जगह बनाने और ग्राफ्ट लगाने का काम एक साथ हो सकेगा जिससे प्रक्रिया तेज होगी और ग्राफ्ट सुरक्षित रहने की संभावना बढ़ेगी।

बालों की मोटाई और लंबाई के अनुसार 18जी और 20जी सुई का चयन किया गया। फोर्सेप की मदद से सुई को इस तरह मोड़ा गया कि वह बालों की जड़ के आकार के अनुसार काम कर सके। इस नवाचार में डॉ. कृतिका गुप्ता, डॉ. कौशिकी सुमन और डॉ. शिवांगी राणा का भी योगदान रहा।

कई त्वचा उपचारों में भी होगा इस्तेमाल
एम्स गोरखपुर की यह नई तकनीक केवल हेयर ट्रांसप्लांट तक सीमित नहीं रहेगी। इसका उपयोग विटिलिगो (सफेद दाग), पीआरपी (प्लेटलेट-रिच प्लाज्मा) थेरेपी, माइक्रोनीडलिंग, केमिकल पील, रेडियो फ्रीक्वेंसी और अन्य कॉस्मेटिक व डर्मा सर्जिकल प्रक्रियाओं में भी किया जा सकेगा। इससे कई उपचारों को कम खर्च में करना आसान होगा।
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देशभर में अपनाई जा सकेगी तकनीक
डॉ. सुनील का कहना है कि इस खोज का उद्देश्य ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित करना है जिसे देश के दूसरे चिकित्सा संस्थान भी आसानी से अपना सकें। कम लागत और आसान उपलब्धता वाली यह तकनीक किफायती स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देगी और मेक इन इंडिया की भावना को मजबूत करेगी।

संस्थान का उद्देश्य बेहतर इलाज के साथ ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित करना है जिन्हें देश के अन्य चिकित्सा केंद्र भी आसानी से अपना सकें। यह पहल किफायती स्वास्थ्य सेवा और मेक इन इंडिया की भावना को मजबूत करती है: डॉ. विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक, एम्स गोरखपुर
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