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Gorakhpur News: मखाना की खेती के लिए गोरखपुर मंडल में तैयार हो रही है जमीन

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- कुशीनगर से होने जा रही शुरुआत, वहां के किसानों ने बिहार में ली है ट्रेनिंग
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- देवरिया और गोरखपुर में भी तलाशी जा रही संभावनाएं
गोरखपुर। मखाना की खेती को बढ़ावा देने के लिए गोरखपुर मंडल में जमीन तैयार की जा रही है। इसकी शुरुआत कुशीनगर से होने जा रही है। वहां पर मखाना की खेती के लिए सरकार की ओर से 16 हेक्टेयर का लक्ष्य दिया गया है। बहुत से किसानों ने बिहार के दरभंगा में जाकर इसकी ट्रेनिंग ली है। वहीं देवरिया मखाना की खेती करने की ट्रेनिंग के लिए सरकार की ओर बजट दिया गया है। गोरखपुर में गोष्ठी कराने के लिए कहा गया जबकि महराजगंज में अभी इस दिशा में प्रयास नहीं किया गया है।
मांग और उत्पादन को देखते हुए सरकार मखाना की खेती को बढ़ावा दे रही है। सरकार का मानना है कि इससे मंडल के किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। सरकार इस पर अनुदान दे रही है। मखाना की खेती तालाबों के साथ ही वहां होगी जहां पर हमेशा पानी उपलब्ध हो। सरकार की ओर से तालाब में खेती करने पर 71 हजार का अनुदान दिया जाएगा जबकि खेतों में करने पर 54800 रुपये अनुदान मिलेगा। इसके प्रति किसानों को जागरूक करने क लिए गोरखपुर में उद्यान विभाग की ओर से दो दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें 200 किसानों ने भाग लिया। मखाना की खेती के फायदे और सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी दी गई।
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कुशीनगर से 30 किसानों ने दरभंगा में ली ट्रेनिंग
कुशीनगर जिले में मखाना की खेती के लिए 16 हेक्टेयर क्षेत्रफल का लक्ष्य निर्धारित है। वहां पर खड्डा ब्लाॅक के 30 किसानों ने दरभंगा के मखाना ट्रेनिंग सेंटर में जाकर उत्पादन के गुर सीखे। ट्रेनिंग लेकर लौटे खड्डा ब्लाॅक के दरगौली गांव निवासी उमेश व धर्मेंद्र जायसवाल ने बताया कि उनके गांव में ग्राम समाज का 35 हेक्टेयर का तालाब है। इसमें बहुत पहले मखाने का उत्पादन होता था। उसे बिहार के लोग ले जाते थे। अब नए सिरे से उत्पादन की तैयारी है। उन्होंने बताया कि इसके लिए तीन दिन की ट्रेनिंग लेकर दरभंगा से रामनगर ग्रामसभा के प्रेम साहनी, सुरेश राय, रामपुर जंगल के धर्मेंद्र जायसवाल, रामनगर के लल्लन कुशवाहा अन्य लोग लौटे हैं।
तालाब में पांच से छह फिट तो खेत में दो फिट चाहिए पानी
खेत में मखाना लगाने के लिए दो फिट पानी की जरूरत पड़ती है जबकि तालाब में इसकी खेती के लिए पांच से छह फिट पानी जरूरी है। तालाबों में मखाना की खेती जहां पर होती है वहां पर एक बार नर्सरी लगाने पर दोबारा उसकी जरूरत नहीं होती है। उसके बीज जो छूट जाते हैं वही नर्सरी के रूप में तैयार हो जाते हैं। यह क्रम लगातार चलता रहता है। हालांकि मखाने की खेती या तो सीधे बीज बोने या नए जल निकायों में पौधों को रोपने के माध्यम से शुरू की जा सकती है।
रोपाई की विधि
मखाना के पौधों को मार्च व अप्रैल में पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे के बीच एक गुणे एक मीटर की दूरी पर रोपा जाता है। रोपाई के दो महीने बाद फूल खिलने लगते हैं। फूल आने के 35 से 40 दिन बाद फल पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं। पूरी तरह से पकने के बाद फल फूट कर तलहटी में बैठने लगते हैं। स्थानीय पेशेवर श्रमिकों की मदद से फल को जलाशयों की तलहटी से एकत्रित किया जाता है।
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मखाना की खेती को बढ़ा देने के लिए सरकार की तरफ से कई प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं। मंडल में कुशीनगर जिले को 16 हेक्टेयर में मखाना उत्पादन का लक्ष्य मिला है। इसके लिए किसानों को अनुदान दिया जा रहा है। वहां के किसानों को ट्रेनिंग के लिए दरभंगा भेजा गया था।
पारस नाथ, जिला उद्यान अधिकारी
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