निर्गुण साहित्य की रचनाओं को खूबसूरत स्वरों और संगीत में पिरोकर जब पेश करते संगीतकार।
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गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे सत्र में निर्गुण बैंड की भव्य संगीतमय प्रस्तुति हुई। बैंड की स्वरलहरियों ने झूमते दर्शकों के बीच साहित्य और संगीत के मेल की सुंदर मिसाल पेश की। गायक, वादक तथा संगीतकार आदित्य राजन, जगदंबा, ऋषभ, आदर्श, शैलेंद्र कबीर और अभिषेक के सुरीले मेल ने निर्गुण साहित्य की रचनाओं को खूबसूरत स्वरों और संगीत में पिरोकर जब पेश किया तो सभागार में मौजूद दर्शक झूम उठे।
बैंड की सबसे खास प्रस्तुति गुरु गोरखनाथ का प्रसिद्ध गीत ‘हसिबा बोलिबा रहिबा रंग’ की रही। यह पहली बार था जब गुरु गोरखनाथ के किसी गीत को संगीतबद्ध करके मंच पर प्रस्तुत किया गया। इस गीत में जीवन को आनंदमय रीति से जीने और अनैतिक तरीकों को त्यागने का संदेश दिया गया है। बैंड ने कबीर की रचना ‘संतो ससुरे को पठवो संदेश’ को गाकर मोहमाया और भौतिकता के जंजाल को नश्वर मानकर मोक्ष की प्राप्ति की भावना को प्रस्तुत किया।
इसके बाद कबीर की ही एक और रचना ‘कहां से आए, कहां जाओगे’ की प्रस्तुति कर मानव के उहापोह की स्थिति को व्यक्त किया। इस प्रस्तुति से अपने कर्तव्यों को कभी नहीं भूलने का संदेश दिया। ‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे’ गाकर ईश्वर की सर्व व्यापकता का संदेश देते हुए अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया। बैंड के सदस्यों ने अमीर खुसरो की रचना ‘जो मैं जानती बिसरत हैं सैंया’ की खूबसूरत सूफियाना प्रस्तुति देकर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया और खूब तालियां बटोरीं। संचालन आत्रेय शुक्ल ने किया।