अस्पताल संचालक, डॉक्टर और बीमा कंपनी के एजेंट की तिकड़ी करती थी क्लेम का खेल
गोरखपुर। डिसेंट हॉस्पिटल के संचालक शमशुल व उसका पार्टनर प्रवीण त्रिपाठी डॉक्टरों और बीमा कंपनी के एजेंटों से मिलकर फर्जी क्लेम का जाल बिछाते थे। बीमा कराने वालों को पता ही नहीं चलता था कि वे कब मरीज बनकर भर्ती हुए थे। उनके नाम से फर्जी खाता खोलवाकर, मेडिकल प्रपत्र और बिल तैयार कर धंधेबाज इंश्योरेंस क्लेम का भुगतान करा लेते थे।
यही नहीं, जांच करने वाला सर्वेयर भी मिला होता था। ऐसे ही सुनियोजित तरीके से धंधेबाजों ने बीमा कंपनी से करीब 1.20 करोड़ रुपये हड़प लिए। क्लेम की संख्या बढ़ी तो बीमा कंपनी की ऑडिट टीम को शक हुआ फिर जांच कराई गई तो शक पुख्ता हो गया।
पुलिस की जांच में भी परत दर परत फर्जीवाड़े की असलियत सामने आ रही है। शहर के कुछ और नर्सिंग होम और अस्पताल के साथ बीमा कंपनी के एजेंट पुलिस की रडार पर हैं। उनके खिलाफ पुलिस के हाथ सबूत लगे हैं। अंदेशा है कि यह नेटवर्क कई जिलों में फैला हुआ है। अब तक करोड़ों रुपये का हेरफेर किया जा चुका है।
एसपी सिटी अभिनव त्यागी के अनुसार, अस्पताल संचालकों का तरीका बेहद सुनियोजित था। संचालक सबसे पहले मेडिकल इंश्योरेंस कंपनी के एजेंटों से बीमित मरीजों का विवरण हासिल कर लेते थे। इसके बाद उनका अस्पताल में डेटा तैयार कर लिया करते थे। फिर मरीज के नाम से फर्जी मेडिकल प्रपत्र बनाए जाते थे जिसमें गंभीर बीमारी का हवाला देकर अस्पताल में भर्ती दिखाया जाता था। इसके बाद क्लेम की पूरी फाइल इंश्योरेंस कंपनी में पेश कर दी जाती थी।
बीमा कंपनी ने शुरुआती स्तर पर इन दस्तावेजों पर भरोसा किया और लाखों रुपये का भुगतान कर दिया। क्लेम की रकम मरीज के नाम पर खोले गए बैंक खाते में भेजी जाती थी। इसके बाद गिरोह में शामिल सभी आपस में रकम का बंटवारा कर लेते थे। कुछ वास्तविक मरीजों के बीमा नवीनीकरण के समय इस फर्जीवाड़े की भनक लगी, तब मामला सामने आया।
कंपनी की आंतरिक ऑडिट टीम ने पकड़ा फर्जीवाड़ा
कंपनी की आंतरिक ऑडिट टीम को जब अचानक क्लेम की संख्या और रकम में असामान्य वृद्धि दिखी तो जांच बैठाई गई। वहीं बीमा के नवीनीकरण में पहले भुगतान न लेने की शिकायत बीमा कराने वालों ने की। इसके बाद शक गहराता गया। ऑडिट टीम ने अपने स्तर से जांच कराई। जांच में कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें मरीज कागजों में तो भर्ती दिखाए गए थे लेकिन वास्तविकता में वे कभी अस्पताल पहुंचे ही नहीं। यहां तक कि कई मरीजों ने बयान दिया कि जिस तारीख को उन्हें अस्पताल में भर्ती बताया गया, उस दिन वे अपने घर पर या अपने काम पर थे। मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस इंश्योरेंस कंपनी की ऑडिट टीम के साथ अब इस मामले की तह तक जाने में जुटी है।
इंश्योरेंस कंपनी की ऑडिट टीम ने पुलिस को सौंपे कई नर्सिंग होम के रिकॉर्ड
एसपी सिटी ने बताया कि शुरुआती जांच में शहर में संचालित कुछ अन्य नर्सिंग होम के भी रिकॉर्ड उनके पास आ चुके हैं। उनसे फर्जी बिलिंग और इलाज का विवरण सामने आया है। संदेह के घेरे में आए संचालकों, डॉक्टरों व बीमा कंपनी के ऑडिट टीम से भी पूछताछ भी की जा रही है। वहीं बीमा कंपनी ने भी इस घोटाले की विस्तृत रिपोर्ट नियामक संस्था को सौंपी है। फिलहाल पुलिस ने कई एजेंटों को चिह्नित कर लिया है और अस्पताल संचालकों के खिलाफ धोखाधड़ी व आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं में केस दर्ज करने की तैयारी चल रही है।
हॉस्पिटल का रजिस्ट्रेशन भी पेंडिंग
एसपी सिटी ने बताया कि डिसेंट हॉस्पिटल की तीन शाखाएं है। पहला गोरखपुर, दूसरा बस्ती व तीसरा खलीलाबाद में है। प्राथमिक जांच में पता चला कि पहले ये हॉस्पिटल डॉ एके सिंह के नाम से रजिस्टर्ड था। वर्तमान में हॉस्पिटल का रजिस्ट्रेशन मार्च से पेंडिंग है। इसकी रिपाेर्ट सीएमओ को भी भेज दी गई है।
वर्जन
इस प्रकरण की जानकारी नहीं है। डिसेंट हॉस्पिटल के रजिस्ट्रेशन की जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई कराई जाएगी।
-डॉ राजेश कुमार झा, सीएमओ
अस्पताल संचालक ने कइयों से ले रखा है लाखाें का कर्ज
रामगढ़ताल थाना प्रभारी नितिन रघुनाथ श्रीवास्तव ने बताया कि अस्पताल संचालक शमशुल व प्रवीण के पकड़े जाने के बाद थाने में चार शिकायतें आई हैं। इसमें बताया गया है कि अस्पताल संचालकों ने उनसे लाखों रुपये का कर्ज ले रखा है। इसकी भी जांच की जा रही है। पीड़ितों का कहना था कि अस्पताल संचालक ने कर्ज होने का हवाला देते हुए रुपये लिए थे। इसे जल्द ही लौटाने का आश्वासन दिया था। पुलिस ने अब इन शिकायती पत्रों की भी जांच शुरू कर दी है।
12 अन्य नर्सिंग होमों के नाम भी आए सामने
एसपी सिटी के अनुसार जांच में 12 अन्य नर्सिंग होम के भी नाम सामने आए हैं। ये बीमाधारित मरीजों का विवरण लेकर उनके नाम से कूटरचित मेडिकल प्रपत्र तैयार कर हेल्थ बीमा की क्लेम ले चुके हैं। दस्तावेजों के सत्यापन के बाद उनके खिलाफ भी जल्द कार्रवाई की जाएगी।