फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Gorakhpur News: सरकार ने लीज पर दी थी जमीन...कर दिया गया बैनामा

विज्ञापन
विज्ञापन
शहर में लीज की संपत्तियां भी खूब हुईं वक्फ, बनती गईं आलीशान कोठियां
विज्ञापन




गोरखपुर। शहर में सरकार की लीज संपत्तियों को पहले वक्फ में बदलने और फिर बैनामा करवाने का बड़ा खेल खेला गया है। शहर में ऐसी कई कोठियां हैं, जो पहले किसी जमींदार की थीं, फिर उसे वक्फ संपत्ति घोषित करा दिया गया। बाद में इसे बेच भी दिया गया। शहर के पार्क रोड पर एक कोठी को लेकर चले विवाद ने वक्फ के नाम पर हुए खेल को सार्वजनिक कर दिया था।



रिकाॅर्ड रूम के साक्ष्य के मुताबिक, पार्क रोड स्थित एक बंगला (2001 में जिसकी डीड बनी) को 1909 में तत्कालीन कलेक्टर की तरफ से एक हिंदू परिवार को लीज पर दिया गया था। लीज जिनके नाम से थी, उनका देहांत 1911-12 में हो गया। वरासत के लिए न्यायालय में वाद दाखिल किया गया। 1937 में इस वाद को लेकर फैसला हुआ और परिवार की बेटी के नाम पर इस लीज को हस्तांतरित कर दिया गया। इसी बंगले को 1944-45 में तीसरे आदमी के नाम पर बैनामा कर दिया गया। इस बैनामे में खेल हुआ।
विज्ञापन




पहला खेल कि लीज प्रत्येक 30 वर्ष पर रिन्यूवल (नवीनीकृत) किया जाता है। ऐसे में बिना फ्री होल्ड के लिए लीज की संपत्ति के बेचा कैसे गया। जिन्हें बेचा गया, उन्होंने अपने नाम के साथ पते में मुतवल्ली लिखवाते हुए (उपनाम) बैनामा ले लिया। इस संपत्ति को बाद अपने पते (उपनाम) मुतवल्ली के आधार पर वक्फ घोषित करते हुए इसे वक्फ एक्ट के तहत बोर्ड के अधीन कर दिया गया।



वक्फ का नियम कहता है कि संपत्ति वक्फ के नाम, जो बोर्ड के तहत संचालित होती है, उसे की जानी चाहिए। उपनाम के जरिये किसी संपत्ति को वक्फ नहीं किया जा सकता। वक्फ सिर्फ उसी संपत्ति को घोषित किया जा सकता है, जो उसकी पुश्तैनी चली आ रही हो या किसी सरकारी लीज की संपत्ति को फ्री होल्ड करवा लिया गया हो। लेकिन, तत्कालीन समय में लोगों ने लीज में खेल किया और सीलिंग और नजूल की जमीनों को भी वक्फ संपत्ति कर दिया।



सेवानिवृत्त एक कर्मचारी की मानें तो रेवेन्यू रिकाॅर्ड की जांच कर ली जाए तो आराजी छावनी में ही कई ऐसी संपत्तियां मिल जाएंगी, जो वक्फ संपत्ति करने के बाद मनमाने तरीके से बेच दी गईं।
विज्ञापन




जमींदारी की जमीनें हो गई वक्फ की



1857 की क्रांति के बाद पूरे देश में जमींदारी प्रथा की शुरूआत हो गई थी। 1860, 1884 और 1914-15 में तीन बार जमींदारी लागू हुई। इसके तहत बंदोबस्त व्यवस्था शुरू हुई, जिसमें 30 वर्ष में आराजी का पुर्ननिर्माण होता था। इसी आराजी के पुर्ननिर्माण में पहले नामों की अदला-बदली की गई। इसके बाद 1954 में वक्फ की स्थापना की गई। इसके पहले 1 जुलाई 1952 को देश में जमींदारी उन्मूलन को लागू किया गया था। वक्फ आने के पहले ही लोगों ने जमींदारी की अपनी जमीनों को वक्फ कर संरक्षित कर लिया और सीलिंग और नजूल को जमींदारी में दिखाते हुए अतिरिक्त भूमि घोषित करते हुए सरकार को दे दिया।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें