बिहार के किशनगंज में रखे जाते हैं चोरी के पशु, रात के अंधेरे में पार कराया जाता है बाॅर्डर
पकड़े गए तस्करों ने उगले राज, पुलिस तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल
गोरखपुर। पशु तस्करों ने अपना नेटवर्क असम और पश्चिम बंगाल तक फैला लिया है। इस नेटवर्क में शामिल बिहार और बंगाल के पशु माफिया प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से गाेवंश चोरी कर उन्हें असम और बंगाल में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। गोरखपुर के गोवंश बिहार के किशनगंज होते हुए असम-बंगाल में एक से सवा लाख रुपये तक में बिक जाते हैं। यह पर्दाफाश हाल ही में पकड़े गए पशु तस्करों से पुलिस की पूछताछ में हुई है।
तस्करों ने पुलिस को बताया कि चोरी या खुले चरागाहों से उठाए गए गाेवंशों को पहले बिहार के किशनगंज, कटिहार और अररिया जिलों में पहुंचाया जाता है। वहां अस्थायी गोदाम जैसे डंप पॉइंट बनाए गए हैं। वहां से रात के अंधेरे में सीमावर्ती रास्तों से असम और पश्चिम बंगाल के बाजार तक गाेवंश को तस्करी के जरिये पहुंचाया जाता है।
तस्करों ने यह भी बताया कि इस धंधे में नवयुवकों की बड़ी भूमिका होती है। वे पुलिस की गतिविधियों की निगरानी करते हैं। जैसे ही पुलिस का गश्त कमजोर होती है या किसी चौकी पर ध्यान भटकता है, गोवंशों से भरे ट्रक सीमावर्ती इलाकों की ओर रवाना कर दिए जाते हैं। कुछ मामलों में स्थानीय चरवाहे और वाहन चालक भी मामूली रकम के लालच में इस नेटवर्क से जुड़ जाते हैं।
सूत्रों के अनुसार, गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज और कुशीनगर से हर माह बड़ी संख्या में पशु चोरी कर बिहार ले जाए जाते हैं। वहां इन्हें पहचान बदलकर या झूठे दस्तावेजों के सहारे आगे असम और बंगाल भेज दिया जाता है। मवेशियों की असली कीमत गोरखपुर में 30 से 40 हजार रुपये होती है, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में इन्हें एक से सवा लाख तक में बेचा जाता है। फिलहाल पुलिस जेल भेजे गए तस्करों के पास से बरामद मोबाइल के जरिये उनके नेटवर्क के अन्य साथियों की तलाश में जुटी है।
-
पकड़े जा रहे छोटे तस्कर, सरगना पुलिस की पकड़ से बाहर
पशु तस्करी रोकने के लिए पुलिस की ओर से कई बार अभियान चलाए जाने के दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयां कर रही है। हर बार कुछ छोटे तस्कर तो पकड़ जाते हैं, लेकिन इस धंधे के सरगना पुलिस की पकड़ से बाहर रहते हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि सीमावर्ती इलाकों में पशु चोरी की घटनाएं बढ़ी हैं और कई बार ट्रक समेत पशु पकड़ने के बावजूद मुख्य तस्कर भाग निकलते हैं। उन्होंने बताया कि तस्कर बेहद संगठित तरीके से काम करते हैं। इनकी नजर हर पुलिस चेकपोस्ट की गतिविधियों पर होती है। अब निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जा रहा है ताकि इन पर लगाम लगाई जा सके।
-
संगठित नेटवर्क और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल
पशु तस्कर अब व्हाट्सएप, टेलीग्राम और लोकेशन ट्रैकिंग का इस्तेमाल कर पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। जैसे ही किसी चेकपोस्ट पर ढिलाई होती है, मवेशियों से भरे ट्रक पार करा दिए जाते हैं।
-
पशु तस्करों पर ऐसे लगाया जा सकता है लगाम
एक रिटायर्ड अधिकारी ने बताया कि यूपी-बिहार-असम और बंगाल की पुलिस को संयुक्त अभियान चलाना चाहिए। हर जिले में साझा कंट्रोल रूम बनाकर सूचना का तत्काल आदान-प्रदान जरूरी है। इसके साथ ही सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन पेट्रोलिंग, सीसीटीवी कैमरे और हाईवे चेक पॉइंट पर लाइव निगरानी से तस्करों की गतिविधियों को रोका जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में पशु मालिकों और प्रधानों की संयुक्त समितियां बनाकर संदिग्ध वाहनों और अज्ञात लोगों की सूचना पुलिस को देने की व्यवस्था की जा सकती है। वहीं जिन क्षेत्रों से लगातार तस्करी के मामले सामने आते हैं, वहां के थाना प्रभारी और बीट पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी तय की जाए। लापरवाही पर निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई हो।
-
वर्जन
पकड़े गए पशु तस्करों से नेटवर्क के बारे कुछ जानकारियां मिली हैं। उसके आधार पर छानबीन चल रही है। तस्करों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई अमल में लाई जा रही है। साथ ही अपराध से अर्जित उनकी संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई की जाएगी। पशु तस्करों के खिलाफ लगातार अभियान भी चलाया जा रहा है।
- एस चनप्पा, डीआईजी रेंज