गोरखपुर। बशारतपुर स्थित खरैया पोखरा कभी बड़े जलाशय का स्रोत था। इसका पानी पीने के काम तो आता ही था, सिंचाई में भी इस्तेमाल होता था। इस पोखरे का दायरा छह हेक्टेयर में था। लेकिन समय के साथ लोगों ने अतिक्रमण किया और अब सिकुड़कर 0.22 हेक्टेयर रह गया है। इसके आसपास शहतूत की खेती थी। यहां धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन भी होते थे। यह कहना है शहर के पुराने जानकारों की, जिन्होंने खरैया पोखरा सहित शहर के सभी ताल-पोखरे के बारे में सर्वे कराकर जानकारियां जुटाई है।
साहित्यकार डॉ. वेद प्रकाश पांडेय ने बताया कि खरैया पोखरा शहर के उत्तरी भाग में रहने वालों के लिए बड़ा जलाशय का स्रोत था। पहले पोखरा साफ सुथरा था तो यहां धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम होते थे। बरसात के मौसम में समीपवर्ती क्षेत्र के वर्षों का जल इसमें संग्रहित होता था। इससे क्षेत्र में जलप्लावन की स्थित नहीं होती थी और भूमिगत जलस्तर भी संतुलित रहता था। अब अतिक्रमण, अपशिष्ट पदार्थों के निस्तारण करने से यह पोखरा प्रदूषित हो चुका है।
राप्ती नदी खिसकी तो अस्तित्व में आया खरैया पोखरा
गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के सेवानिवृत आचार्य प्रो. शिव शंकर वर्मा ने बताया कि राप्ती नदी पहले शहर से होकर गुजरती थी। समय के साथ नदी पश्चिम की ओर बढ़ती गई और छूटे भाग रह गए, वही ताल-पोखरे हैं। खरैया पोखरा के बारे दस्तावेज तो नहीं मिले हैं लेकिन राप्ती नदी 200 वर्ष में 300 मीटर पश्चिम की ओर खिसकी है। पहले यह बसंतपुर से सटकर बहती थी। सर्वे में यह पाया गया कि राप्ती नदी करीब 1000 वर्ष पहले शहर से होकर बहती रही होगी और इसके बाद ही खरैया पोखरा अस्तित्व में आया होगा। इसका वर्तमान क्षेत्रफल 0.22 हेक्टेयर है, जबकि 2003 के भूउपग्रह मानचित्र के आधार पर क्षेत्रफल लगभग छह हेक्टेयर था। अतिक्रमण को खाली कराने के बाद यह अपने पुराने अस्तित्व में आ सकेगी।