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Gorakhpur News: पढ़ने की जगह पढ़ाई की चिंता से डिप्रेशन का शिकार हो रहे युवा

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जल्द सफलता हासिल करने का दबाव बना रहा युवाओं को मानसिक रूप से बीमार
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गोरखपुर विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर ने स्कूली छात्र-छात्राओं पर किया शोध

गोरखपुर। आजकल युवाओं में तनाव और अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इनमें ज्यादातर वे बच्चे हैं जो स्कूल में पढ़ रहे हैं या फिर 12वीं के बाद किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं। इनके तनाव का कारण पढ़ाई और जीवन में जल्दी सफल होने की चिंता है। बहुत सारे बच्चे पढ़ाई करने की जगह उसकी चिंता कर रहे हैं जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विस्मिता और उनके शोधार्थी हरीश चौहान ने 14 से 20 वर्ष के छात्र-छात्राओं की मानसिक स्थिति पर अध्ययन किया है। इसे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च एंड रिव्यूज ने प्रकाशित भी किया है। डॉ. विस्मिता ने बताया कि आजकल के बच्चे अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित रहते हैं। उनके अंदर धैर्य की कमी आई है। एक से दो बार विफल होने के बाद वे अवसाद में चले जाते हैं। शैक्षणिक क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उनके बाहरी परिवेश से हमेशा दबाव रहता है। ये दबाव विद्यार्थी को हतोत्साहित करने और निराशा बढ़ाने के प्रमुख कारकों में से एक है। इसी वजह से उनमें खुद को खत्म करने के ख्याल आने शुरू हो जाते हैं।
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रिश्तेदारों का रहता है दबाव
डॉ. विस्मिता ने बताया कि उन्होंने अलग-अलग कक्षाओं के 300 छात्र-छात्राओं पर अध्ययन किया। आमतौर पर भारतीय परिवारों में रिश्तेदार, दोस्तों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इस वजह से विद्यार्थियों से उनके अंक के बारे में बहुत सारे लोग पूछते हैं। इसका उनपर दबाव बनता है। कई बार उन्हें यह अहसास कराया जाता है कि यदि वे शिक्षा में अच्छे नहीं हैं तो उनका कोई भविष्य नहीं है। इससे उनमें निराशा की भावना घर करती है और वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो जाते हैं। ये एहसास अक्सर उनसे कड़ी मेहनत कराता है, लेकिन फिर भी अगर उन्हें परिणाम नहीं मिलते तो उनमें आत्महत्या की भावना उत्पन्न हो सकती है।
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ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सतर्क
डॉ. विस्मिता ने बताया कि यदि बच्चा उदास, चिंतित या अवसादग्रस्त दिखाई दे। आत्महत्या के बारे में बात करे या आत्महत्या करने की धमकी दे और ज्यादातर समय अकेले रहे तो सतर्क होने की जरूरत है। मां-बाप को चाहिए कि वे बच्चों से बात करें और उनकी समस्याओं को सुनें। जरूरत पड़ने पर काउंसलर के पास ले जाएं।
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