विशेषज्ञों के मुताबिक, वन्यजीवों का चिड़ियाघर में भी यही रवैया, इलाज में होती है परेशानी
गोरखपुर। अपनी कमजोरी दिखाएंगे तो विरोधी ज्यादा आक्रामक होंगे...तमाम इंसानों को यह बात समझने में लंबा वक्त लग जाता है या फिर बड़े-बूढ़े समझाते थक जाते हैं। जबकि जंगल के जानवर इसे बखूबी समझते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोरी दिखाने पर जंगल में मारे जाने के भय से जानवर खुद अपनी बीमारी छिपा लेते हैं। रेस्क्यू कर चिड़ियाघर लाने के बाद भी उनका रवैया यही रहता है। इसलिए जानकारों को उनके इलाज में दिक्कतें आती हैं।
चिड़ियाघर में पिछले डेढ़ माह में चार वन्यजीवों की मौत हो चुकी है। इनमें तीन ऐसे हैं, जिन्हें जंगल से रेस्क्यू कर लाया गया था। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और मौत हो गई।
बाघ केसरी, बाघिन शक्ति और भेड़िया भैरवी की मौत लगभग एक ही तरीके से हुई। केसरी का व्यवहार शांत था, लेकिन वह मौत से एक दिन पहले उग्र हो गया। उसने नाइटसेल की ग्रिल तोड़ने के चक्कर में खुद को घायल कर लिया। चोट ज्यादा लगने की वजह से उसकी मौत हो गई। वह तनाव में था, लेकिन बाड़े में रहने पर आराम से बैठा रहता था। यही वजह रही कि जानकार भी उसकी परेशानी को सही तरह भांप नहीं सके।
बाघिन शक्ति पिछले एक साल से अस्पताल के क्रॉल में थी। डिहाईड्रेशन हुआ तो उसने पहले दिन पानी कम लिया। दूसरे दिन जब हालत ज्यादा बिगड़ी तो इलाज शुरू हुआ। इस दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर सामने आया। वहीं, भैरवी भी डिहाईड्रेशन का शिकार थी, हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गई।
चिड़ियाघर के उप निदेशक एवं मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. योगेश प्रताप सिंह ने बताया कि जंगल के जानवर यदि बीमार हैं तो भी वह उसे नहीं दर्शाते। जंगल में यदि वह ऐसा करते हैं तो दुश्मन उन्हें आसानी से मार देगा। चिड़ियाघर आने के बाद भी वह हिम्मत नहीं दिखाते हैं। बीमार पड़ने पर भी वह चलते और दहाड़ते हैं। भोजन-पानी छोड़ने पर ही इसके बारे में पता चल पाता है।
तेंदुओं में भी तनाव
चिड़ियाघर के रेस्क्यू सेंटर में अभी छह तेंदुए हैं। इंसानों पर हमला करने की वजह से इन्हें जंगल में दोबारा नहीं छोड़ा गया। लेकिन, जंगल में अपना अधिकांश समय व्यतीत करने के बाद अब पिंजरे में वे तनाव में रहते हैं। यहां उन्हें कम जगह मिलती है और साथ ही एक ही तरह का मीट दिया जाता है। यह भी तनाव में रहने की एक वजह है।