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Gorakhpur News: दारुल कजा में शरीअत के तहत सुलझेंगे पारिवारिक मसले

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कुरआन-हदीस की रोशनी में आपसी सुलह-समझौते से निपटेंगे विवाद
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कम होगा अदालत का बोझ, मुश्किल और पेचीदा मसले ही जाएंगे कोर्ट
गोरखपुर। शहर में अब शरीअत के मुताबिक न्याय की राह आसान होने जा रही है। मुस्लिम समुदाय के लिए गोरखपुर में दारुल कजा की स्थापना की कवायद शुरू हो गई है। इसके जरिये विवाह, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवाद जैसे मसलों का समाधान इस्लामी कानून के अनुसार किया जाएगा। काजी और आलिम पक्षकारों की बात सुनकर सुलह-सफाई के जरिये विवाद निपटाएंगे।

जानकारी के अनुसार, दारुल कजा की स्थापना का उद्देश्य अदालतों पर बोझ घटाना और लोगों को धार्मिक नियमों के मुताबिक न्याय दिलाना है। यहां दिए जाने वाले फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होंगे बल्कि दोनों पक्षों की आपसी सहमति से लागू किए जाएंगे।
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ऊंचवा मस्जिद के इमाम मुफ्ती अहमदुल्लाह का कहना है कि यह पहल समाज में भाईचारा, समझदारी और अमन का माहौल मजबूत करेगी। इमारत-ए-शरिया और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े विद्वानों का मानना है कि दारुल कजा लोगों को शरीअत के दायरे में रहकर अपने मसले हल करने का सुलभ माध्यम देगा।

कल होगा शुभारंभ
मुफ्ती मतीउर्रहमान कासमी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से गोरखपुर में दारुल कजा की स्थापना को मंजूरी मिल गई है। इसका शुभारंभ 26 अक्तूबर को दोपहर दो बजे किया जाएगा। मुख्य कार्यक्रम एमएसआई इंटर कॉलेज के ऑडिटोरियम में होगा। इसमें मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, मौलाना मोहम्मद फजलुर्रहमान मोज्जद्दी और अन्य प्रमुख उलेमा शिरकत करेंगे।
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दारुल कजा यानी शरीअत के अनुसार न्याय का घर
दारुल कजा इस्लामी शरीअत के तहत चलने वाली एक धार्मिक न्याय व्यवस्था है, जहां काजी विवाह, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवादों का समाधान करते हैं। भारत में इसकी कानूनी मान्यता औपचारिक अदालत जैसी नहीं है लेकिन इसे समुदाय के लोग आपसी सहमति से स्वीकार करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दारुल कजा के फैसले बाध्यकारी नहीं बल्कि सलाहनुमा होते हैं। इसका उद्देश्य समाज में शांतिपूर्ण समाधान, धार्मिक मार्गदर्शन और आपसी सौहार्द बनाए रखना है। कई राज्यों में इमारत-ए-शरिया और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत दारुल कजा कार्यरत हैं।
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