रहें होशियार, पिछले साल 54 नमूनों में से 30 में मिलावट, 10 अखाद्य श्रेणी में पाए गए
इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच लिए गए 22 नमूनों में से तीन असुरक्षित, नौ में मिलावट की पुष्टि
पक्का बिल होने के चलते जब्त नहीं होती दाल, रिपोर्ट आने तक बिक जाती है बाजार में
गोरखपुर। शाकाहारी भोजन में प्रोटीन की सबसे बड़ी स्रोत दाल भी अब सुरक्षित नहीं रह गई है। धंधेबाज अपने मुनाफे के लिए लोगों की सेहत को दांव पर लगा रहे हैं। जांच में सामने आया है कि बाजार में बिक रही दालों का आधे से ज्यादा हिस्सा मिलावटी है। पिछले साल 54 नमूनों में से 30 में मिलावट पाई गई है। 10 नमूने अखाद्य श्रेणी में पाए गए हैं।
खेसारी के अलावा दाल को चमकाने के लिए पीले रंग (टेट्राजीन) से पॉलिश किया जा रहा है। यह पॉलिश लिवर के लिए असुरक्षित है। वहीं खेसारी दाल से लकवा और गठिया से जुड़ीं बीमारियां होती हैं। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसी मिलावटी दाल शरीर को कई गंभीर बीमारियों दे रही हैं।
पूर्वांचल में दाल के लिए सबसे अधिक मांग अरहर की है, दूसरे नंबर पर मटर और तीसरे पर चना है। इसके बाद उड़द व मूंग की खपत होती है। मांग अधिक और उपज कम होने की वजह से अरहर की दाल में ही मिलावट भी सबसे अधिक है। गोरखपुर की मंडी में अरहर दाल की आपूर्ति मध्य प्रदेश व राजस्थान से होती है।
पिछले साल खाद्य सुरक्षा विभाग ने दाल के 54 नमूने लिए थे, जिनमें से 30 में मिलावट पाई गई और 10 नमूने तो अखाद्य श्रेणी के निकले। वहीं इस साल भी अप्रैल से अगस्त के बीच लिए गए 22 नमूनों में से तीन को असुरक्षित घोषित किया गया जबकि नौ नमूनों में मिलावट की पुष्टि हुई। मतलब साफ है कि बाजार में बिक रही करीब 68 प्रतिशत दाल खाने लायक नहीं बची है।
अरहर दाल में सबसे आसान है मिलावट
बाजार में सबसे अधिक बिकने वाली अरहर दाल में मिलावट सबसे आसान है। वजह यह कि खेसारी दाल का रंग और स्वरूप अरहर दाल से मिलता है। ऐसे में अरहर दाल के साथ उसे आसानी से मिलाया जाता है। दूसरे अरहर दाल जहां थोक में 90 रुपये है वहीं खेसारी दाल 35 से 40 रुपये किलो के भाव मिल जाती है। इससे धंधेबाजों को मोटा मुनाफा होता है।
हर दिन है करीब 600 टन की खपत
गोरखपुर की मंडी में हर दिन करीब 600 टन दाल की खपत होती है। इसमें से अकेले करीब 200 टन दाल अरहर की होती है। खाने के अलावा दालों का सबसे अधिक उपयोग नमकीन बनाने में होता है। शहर में 50 से अधिक छोटी-बड़ी फैक्टरियों में दाल से नमकीन बनाई जाती है।
पक्का बिल दिखाकर बच निकलते हैं धंधेबाज
खाद्य सुरक्षा विभाग का दावा है कि टीम लगातार बाजार से नमूने ले रही है लेकिन जब तक रिपोर्ट आती है तब तक दाल बिककर खत्म हो जाती है। वजह यह है कि व्यापारी पक्का बिल दिखाकर अपना बचाव कर लेते हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद जब तक मुकदमा चलता है, तब तक वही मिलावटी दाल उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंच चुकी होती है। पिछले साल सहजनवां में खेसारी दाल पकड़ी गई। अरहर दाल में मिलावट की आशंका में टीम ने जब इसे पकड़ा तो व्यापारी पक्का बिल दिखाकर यह कहने लगा कि बाहर से माल आया है, ऐसे में वह दोषी नहीं है। इस साल पिपराइच और पीपीगंज में पकड़ी गई मिलावटी दाल के मामले में भी ऐसा ही हुआ। धंधेबाज खाद्य सुरक्षा अधिकारियों पर ही यह दबाव बनाने लगे कि पक्का बिल होने के बाद भी केवल परेशान किया जा रहा है। इसके बाद टीम ने नमूना लेकर बाकी दाल छोड़ दी थी। वह दाल बिक गई और अब उसका सैंपल फेल आया है।
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डॉक्टर बोलेदाल प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत है। इसमें कृत्रिम रंग और रसायनों का इस्तेमाल शरीर के लिए बेहद हानिकारक है। लंबे समय तक ऐसी दाल का सेवन करने से किडनी और लिवर पर बुरा असर पड़ता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह और भी खतरनाक है।
डॉ. गौरव पांडेय, जनरल फिजिशियन
वर्जन
दालों को चमकदार बनाने के लिए रंगने और खेसारी मिलाकर बेचने की शिकायत मिलने पर छापा मारा गया। तीन जगह खेसारी दाल पकड़ी गई। अन्य जगह रंगी दाल पकड़ी गई। जहां की रिपोर्ट आ गई है, उन दुकानदारों के खिलाफ विधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। लोगों को भी सलाह दी गई है कि दाल खरीदते समय यह चेक कर लें कि उसे रंगा तो नहीं गया। अगर कोई आशंका है तो शिकायत करें। शिकायतकर्ता का नाम गोपनीय रखते हुए जांच कर कार्रवाई होगी।
-डॉ. सुधीर कुमार सिंह, सहायक आयुक्त खाद्य