31 मई 2017 को कोर्ट ने मैनफ्रैंड को जमानत के लिए दो जमानतदार पेश करने का आदेश दिया। मैनफ्रैंड की पत्नी जूलिया ने दो जमानतदारों के नाम दिए, लेकिन जांच में एक फर्जी निकल गया, जिससे मैनफ्रैंड को जमानत नहीं मिल पाई। इसके बाद जूलिया ने जर्मनी दूतावास व गृह मंत्रालय (भारत सरकार) के अधिकारियों को पत्र लिखकर मदद मांगी।
वर्ष 2018 में मैनफ्रैंड को कोर्ट ने दस साल का कारावास, डेढ़ लाख रुपये जुर्माना व जुर्माना न देने पर छह माह की अतिरिक्त सजा सुनाई। तभी से वह गोरखपुर जेल में बंद है। वह महराजगंज व गोरखपुर जेल में छह साल की सजा काट चुका है। चार साल की सजा अब जर्मनी की जेल में काटेगा।
गोरखपुर जेल में मैनफ्रैंड समेत दो विदेशी बंदी
वर्तमान में गोरखपुर जेल में मैनफ्रैंड और पाकिस्तान का आदिल ही विदेशी बंदी हैं। मैनफ्रैंड के चले जाने के बाद केवल आदिल बचेगा। दोनों को वर्तमान समय में हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा गया है।
27 सितंबर 2017 को जर्मनी दूतावास के अधिकारी मैंनफ्रेंड से मिलने गोरखपुर जेल आए थे। उनके साथ मैनफ्रैंड की लीगल एडवाइजर यामिनी महाजन भी थीं। जर्मनी दूतावास के अधिकारियों ने मैनफ्रैंड को कानूनी मदद दिलाने का भरोसा दिया था। इस बीच पत्नी जूलिया केस की पैरवी के सिलसिले में जर्मनी दूतावास व गृह मंत्रालय के चक्कर लगाती रही।
पत्नी के अनुरोध व दूतावास के प्रयासों के बाद जेल अधिकारियों ने शासन को पत्र लिखकर मैनफ्रैंड को जर्मनी की जेल में शिफ्ट करने की अनुमति मांगी थी। जूलिया पांच साल तक केस की पैरवी के सिलसिले में जेल, कचहरी से लेकर दूतावास के चक्कर काटती रही। लॉकडाउन से पहले तक वह शाहपुर क्षेत्र में जेल के पास किराए का कमरा लेकर रही।
गोरखपुर जेल/वरिष्ठ अधीक्षक प्रभारी व डीआईजी डॉ. रामधनी ने कहा कि मैनफ्रैंड को एनडीपीएस एक्ट में 10 साल की सजा मिली है। छह साल की सजा वह काट चुका है। कोर्ट से जमानत भी मंजूर हो गई है, लेकिन जमानतदार नहीं मिलने से उसकी रिहाई अटक गई। दूतावास की पहल पर उसे शेष सजा जर्मनी की जेल में काटने की अनुमति मिली है। बंदी को जर्मनी भेजने की तैयारी चल रही है। जाने की तिथि अभी तय नहीं हुई है।