इस बीमारी में मरीजों को कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। यही वजह है मरीजों के आंखों की रोशनी चली जाती है। काला मोतियाबिंद में आंखों की नसों (ऑप्टिक नर्व) पर दबाव पड़ता है, इससे उन्हें काफी नुकसान पहुंचता है। एक बार अगर आंखों की रोशनी चली गई तो दोबारा नहीं मिलती है।
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जिला अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अंजनी कुमार गुप्ता ने बताया कि इस बीमारी के शिकार 40 से 45 वर्ष के युवा भी हो रहे हैं। तीन से चार युवा ऐसे मिले हैं, जिनके आंखों की रोशनी 70 फीसदी से अधिक जा चुकी है। इनकी सर्जरी भी अब नहीं हो सकती है। क्योंकि, इस बीमारी में सर्जरी से भी आंखों की रोशनी वापस नहीं हो सकती है। दवा देकर इलाज किया जा रहा है।
पांच तरह का होता है काला मोतियाबिंद
डॉ. राम कुमार जायसवाल ने बताया कि काला मोतियाबिंद पांच तरह का होता है। पहला प्राथमिक या ओपन एंगल ग्लूकोमा, एंगल क्लोजन ग्लूकोमा, लो टेंशन या नार्मल टेंशन ग्लूकोमा, कोनजेनाइटल ग्लूकोमा और सेकेंडरी ग्लूकोमा होता है। पूर्वांचल में सबसे अधिक मरीज ओपन एंगल ग्लूकोमा के मिलते हैं। हर माह 25 से 30 मरीज काला मोतियाबिंद के इलाज के लिए आ रहे हैं। इनमें पांच से सात फीसदी मरीजों की आंखों की रोशन भी चली जा रही है।