नौकरी छोड़ने बाद रामबली मिश्र अपने गांव खोपापार आकर हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने लगे। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में कई विद्यालय खोले। सन 1930 में हिंदी साहित्य विद्यालय खोपापार और 1940 में अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना की। सभी विद्यालय आवासीय थे। विद्यालय का खर्चा क्षेत्र के लोगों के सहयोग से चलता था। इन विद्यालयों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात आदि प्रांत के छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। इसकी सराहना महात्मा गांधी ने 1936 में अपनी हरिजन पत्रिका में की थी। उन्होंने इसे पूर्वांचल राष्ट्रीय चेतना केंद्र के रूप में उल्लेख किया था।
अंग्रेजों ने जलवा दिया घर, डाल दिया जेल में
1942 में अंग्रेजों ने पंडित रामबली मिश्र का घर जलवा दिया। साथ ही चरखा केंद्र को भी जला दिया गया। पंडित रामबली मिश्र व उनकी पत्नी कैलाशी देवी को गोरखपुर जेल में बंद कर दिया गया। जेल में इनकी मुलाकात बलिया जिले के रामपुर कानूनगो गांव के निवासी चंद्रिका प्रसाद वकील व उनकी पत्नी से हुई। जेल में ही चन्द्रिका प्रसाद के पत्नी का निधन हो गया। उनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र को पंडित रामबली मिश्र ने गोद ले लिया।
धुरियापार से विधायक चुनी गई थी
जेल से छूटने के बाद 1952 में कैलाश कैलाशी देवी धुरियापार विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर विधायिका बनी। दोनों स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी आज नहीं है। उपेक्षित उनका गांव आज भी अपने छोटी गांधी की कहानी को बड़ी तवायता के साथ कहता है। लोगों को उम्मीद है कि किसी न किसी दनि शासन-प्रशासन का ध्यान इस गांव पर जाएगा और इसका विकास होगा।