फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जान जोखिम में डालकर जंगल की सुरक्षा कर रहे हैं ये लोग, लाठी-डंडे के सहारे निभा रहे ड्यूटी

Mon, 11 Jan 2021 11:32 AM IST
vivek shukla रोहित सिंह, गोरखपुर।
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में वन विभाग के रेंजर और वन रक्षकों को बिना प्रशिक्षण ही राइफल और बंदूकें सौंप दी गई हैं। इन्होंने अपनी अब तक की सर्विस में कभी हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी नहीं लिया। ऐसे में जरूरत पड़ने पर चलाएंगे कैसे, यह बड़ा प्रश्न है।
विज्ञापन

 
वर्तमान में जहां अपाराधियों के हाथों में नाइन एमएम और .32 बोर की अवैध पिस्टल और बंदूक होती है, ऐसे में इन्हें 20 से 30 वर्ष पुरानी .315 बोर की राइफल और डबल बैरेल बंदूक से सामना करना पड़ता है। नतीजा, हमेशा विभाग को अपनी भद्द पिटवानी पड़ती है।

वन विभाग गोरखपुर प्रभाग में पांच रेंज वन क्षेत्र के हैं। इनमें कैंपियरगंज, फरेंदा, तिनकोनिया, पनियरा और गोरखपुर रेंज शामिल है। सभी रेंज में लगभग पांच बीट हैं, इन्हीं के जिम्मे वन क्षेत्र की निगरानी और तस्करी रोकना होता है। इन बीटों में एक राइफल और एक डबल बैरल बंदूक दी गई है। ऐसे में इन पांचों रेंज में लगभग 50 बंदूकें तो हैं लेकिन किसी का कोई भरोसा नहीं।
विज्ञापन

विभाग के पास पर्याप्त कारतूस तक नहीं

यहां तैनात रेंजर और वन रक्षकों की ऊम्र 50 वर्ष से ऊपर है। इन्होंने कभी इसे चलाने का प्रशिक्षण भी नहीं लिया। प्रभाग में तैनाती होने के बाद सीधे इन्हें बंदूकें सौंप दी गई। अब ऐसे में आखिर जब इन्हें बंदूक लोड (भरना) करना नहीं आता तो चलाएंगे कैसे? सूत्रों की मानें तो विभाग ने इन्हें कभी चलाए जाने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया।
 
बंदूके विभाग के मालखाने में ही पड़ीं हैं। सूत्रों की मानें को वन विभाग के पास पर्याप्त कारतूस तक नहीं हैं, जो हैं वह चलाने के काबिल नहीं। बताया कि राइफल की गोलियां तो एक बार चला भी सकते हैं लेकिन डबल बैरल बंदूक की गोलियां तक खराब हो गई हैं।

प्रभारी डीएफओ एसएन मौर्य ने बताया कि वन विभाग के पास आधुनिक हाथियार नहीं हैं और न ही चलाने का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रभाग में कहीं शूटिंग रेंज भी नहीं है कि समय समय पर इनके प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण बुलाने का इंतजाम किया जा सके। अधिकतर लाठी डंडे के सहारे जंगल में कांबिंग करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दी सलाह, हथियार उपलब्ध कराएं

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य की सरकारों को वन कर्मियों को बुलेट प्रूफ जैकेट देने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि इनके हाथों में लाठी डंडे की जगह बंदूकें भी दी जाएं। अब सवाल है कि आखिर इस तरह बंदूकें अगर दे भी दी गईं तो क्या फायदा? चलाना आता नहीं, तो खुद के बचाव के लिए लाठी डंडे का ही प्रयोग करेंगे। बुलेट फ्रूफ जैकेट दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया है। विभाग के अधिकारी भी प्रशिक्षण केंद्र को लेकर गंभीर है। इससे जिनके हाथों में बंदूके दी जाएंगी, उन्हें चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाएगा
वन मंत्री ने रविवार को चिड़ियाघर के निरीक्षण के दौरान पत्रकारों को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के सभी आदेशों का पालन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वन विभाग में कुछ संशोधन का अभाव है। इसे भी समय रहते पूरा कर लिया जाएगा। वन टीम पर जंगल के अंदर सुरक्षा करने के साथ पेड़ों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी होती है। वन विभाग के लोग जान जोखिम में डालकर जंगल में जंगली जानवरों के बीच में रहते हैं और उनकी देखरेख करते हैं। शिकारियों से जानवरों का बचाव भी करते हैं। ऐसे में उनके हित के बारे में सरकार जल्द ही कोई ठोस कदम उठाएगी।
विज्ञापन

लाठी डंडे हाथ में लेकर करते हैं सुरक्षा

प्रभारी डीएफओ ने कहा कि जंगल में बंदूक चलाना मुश्किल भरा होता है। घने जंगल के बीच हाथों में लाठी डंडा लेकर ही वन रक्षक जाते हैं। अक्सर जंगल में घुमंतू स्तर के तस्कर ही मिलते हैं जिन्हें इन्हीं से भगा दिया जाता है। देर रात जंगल के बाहर तस्कर गाड़ियों से आते जाते हैं, उनके पास आधुनिक बंदूकें होती हैं।

दो साल पहले डिप्टी रेंजर को मार दी थी गोली
15 जुलाई 2018 को खोराबार के रामलखना जंगल में अवैध कटाई कर रहे तस्करों की सूचना पर वन विभाग ने छापेमारी की थी। कटान रोकने गए डिप्टी रेंजर डीएन पांडेय को तस्करों ने गोली मार दी थी। गंभीर रूप से घायल रेंजर को वन विभाग के अधिकारियों ने मेडिल कॉलेज में भर्ती करवाया। सूत्रों की मानें तो उस वक्त भी विभागीय असलहा नहीं चल पाने की वजह से तस्कर हावी हो गए थे।

चीफ कंजर्वेंटर ऑफ फॉरेस्ट भीमसेन ने बताया कि विभाग के पास आधुनिक हथियार नहीं हैं। राइफल और डबल बैरल बंदूकें ही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विभाग को लेकर कुछ निर्देश दिए हैं। हालांकि इसकी जानकारी अखबारों के माध्यम से ही हुई है। आदेश की प्रति आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें