गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के बारे में गलत जानकारी देकर छल करने के आरोप में गोरखपुर शहर के तीन महिला समेत चार डॉक्टरों के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया गया है। इन आरोपी डॉक्टरों ने विभिन्न जांच रिपोर्टों के आधार पर एक महिला के जिस गर्भस्थ शिशु को पूरी तरह से स्वस्थ बताया, वह शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग पैदा हुआ। शिकायत के बाद सीएमओ ने मेडिकल बोर्ड से जांच कराई तो डॉक्टरों पर लगाए गए आरोप सही पाए गए। इसके बाद जांच रिपोर्ट व तहरीर के आधार पर कैंट पुलिस ने मामला दर्ज करके तहकीकात शुरू कर दी है।
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इस मामले में डॉक्टरों की लापरवाही पर मेडिकल बोर्ड ने अलग-अलग चिकित्सकों की जिम्मेदारी तय करके रिपोर्ट मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) डॉ. श्रीकांत तिवारी को सौंपी है। यही रिपोर्ट पीड़ित अभिषेक कुमार पांडेय को भी दी गई है।
दिव्यांग शिशु पैदा होने का मामला जिलाधिकारी के. विजयेंद्र पांडियन के पास 29 सितंबर 2020 को पहुंचा था। इस पर जिलाधिकारी ने सीएमओ से रिपोर्ट मांगी थी। सीएमओ ने 23 नवंबर को जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित कर दिया। बोर्ड ने अलग-अलग चिकित्सकों की भूमिका की जांच की और 15 दिसंबर को रिपोर्ट सीएमओ को सौंप दी। अब आगे की कार्रवाई सीएमओ को करनी है।
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जांच रिपोर्ट के मुताबिक प्रथम दृष्टया डॉ. काजल वर्मा की लापरवाही मिली है। डॉ. काजल वर्मा ने पांच अगस्त 2020 को गर्भावस्था के 34वें सप्ताह में महिला की जांच की थी। डॉक्टर काजल ने जो रिपोर्ट दी थी, उसके मुताबिक गर्भस्थ शिशु में किसी तरह की विकृति नहीं थी, जो प्रसव के बाद गलत साबित हुई है। लिहाजा, डॉक्टर की लापरवाही साबित हुई है। इस सिलसिले में डॉक्टर काजल अपना बयान दर्ज कराने मेडिकल बोर्ड के सामने उपस्थित नहीं हुईं। मुकदमा दर्ज होने के बाद अमर उजाला संवाददाता ने बात करने की कोशिश की लेकिन संपर्क नहीं हो सका।
मेडिकल बोर्ड की जांच में डॉ. अंजू मिश्रा की लापरवाही भी उजागर हुई है। जांच रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. अंजू मिश्रा ने 30 मार्च 2020 को गर्भावस्था के 19वें सप्ताह में महिला की जांच की थी। जांच में चारों लिंब दिख रहे हैं। एएफएल गर्भावस्था के अनुसार सामान्य है। डॉ. अंजू मिश्रा ने शिशु के ललाट पर एक ग्रोथ बताया। साथ ही कहा कि कंप्यूटराइज्ड होने के कारण फोर लिंब आर सीन प्रिंट हो गया।
इस पर बोर्ड के सदस्यों ने आपत्ति की और कहा कि लेवल-2 अल्ट्रासाउंड शारीरिक विकृति के आकलन के लिए होता है। एफआई भी सामान्य है। लिहाजा, चिकित्सक की लापरवाही साफ दिख रही है। मेडिकल बोर्ड ने डॉ. नेहल छापड़िया को क्लीन चिट नहीं दी है। जो जांच रिपोर्ट दी है, उसके मुताबिक डॉ. नेहल छापड़िया ने 9 मई को गर्भावस्था के 25वें सप्ताह महिला की जांच की थी।
सवालों के घेरे में सास-बहू की रिपोर्ट
डॉ. नेहल ने गर्भस्थ शिशु की वाइबिलिटी जांची और पहले की लेवल-2 रिपोर्ट देखकर महिला को छोड़ दिया, जिसे गलत माना गया। बोर्ड के सदस्यों का कहना था कि शारीरिक रूप से बड़ी विकृति देखी जानी चाहिए थी। सिर्फ वाइबिलिटी देखकर छोड़ना ठीक नहीं है।
डॉ. अरुणा छापड़िया की जांच रिपोर्ट पर भी मेडिकल बोर्ड ने सवाल उठाए हैं। बोर्ड के मुताबिक डॉ. अरुणा ने छह जुलाई 2020 को गर्भावस्था की जांच की थी। जो रिपोर्ट दी थी, उसमें शारीरिक विकृति न होने की बात लिखी थी। जांच में यह गलत पाया गया है। सोनोलाजिस्ट ने रिपोर्ट एएफआई का उल्लेख ही नहीं किया था। इससे पहले डॉ. अरुणा छापड़िया ने 20 जनवरी 2020 को महिला के गर्भावस्था की जांच की थी। इस मामले में मेडिकल बोर्ड ने डॉ. अरुणा को क्लीन चिट दी थी।
मुकदमे की नामजद आरोपित डॉ. अरुणा छापड़िया और डॉ. नेहल छापड़िया रिश्ते में सास-बहू हैं। मेडिकल बोर्ड ने एक मामले में डॉ. अरुणा छापड़िया को भले ही क्लीन चिट दी है, लेकिन दूसरे मामले की जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। डॉ. नेहल की जांच रिपोर्ट भी ठीक नहीं है।
दर्ज मुकदमों में ये हो सकती है सजा
धारा 417: छल करना (अधिकतम एक साल कारावास या आर्थिक दंड या दोनों) धारा 420: धोखा देना (एक साल की अवधि तक कारावास, जिसे सात साल तक अधिकतम बढ़ाया जा सकता है और आर्थिक दंड या दोनों)
छापड़िया हॉस्पिटल (डॉ. नेहल छापड़िया की सास) की निदेशक डॉ. अरुणा छापड़िया ने बताया कि कलर डॉप्लर (लेवल-टू, अल्ट्रासोनोग्रॉफी) की रिपोर्ट के आधार पर बच्चे की स्थिति सामान्य बताई थी। जो रिपोर्ट आई, उसकी सही जानकारी दी थी। मेरे सेंटर पर जब जांच हुई थी, उस वक्त बच्चा आठ सप्ताह और चार दिन का था। आठ सप्ताह में गर्भस्थ शिशु के अंग विकसित नहीं होते हैं। ऐसे मेें शिशु की शारीरिक संरचना के बारे में जानकारी दे पाना संभव नहीं है। सीएमओ की ओर से गठित मेडिकल बोर्ड को भी यही जानकारी दी गई थी। बोर्ड ने निर्दोष मानते हुए क्लीन चिट दी है।
प्रज्ञा हॉस्पिटल की डॉ. अंजू मिश्रा ने बताया कि कोरोना महामारी के बीच अल्ट्रासाउंड कराने आए थे। पहली बार जब अल्ट्रासाउंड किया गया तो बच्चे का मूवमेंट कम था। इस कारण शिशु के हाथों की सही जानकारी नहीं मिल सकी। कई बार ऐसे केस आते हैं, जिसमें बच्चे की सही जानकारी नहीं मिल पाती है। ऐसे केस में कुछ दिन बाद दोबारा अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाया जाता है। जिस परिवार ने मुकदमा दर्ज कराया है, उन्हें 10 दिन बाद बुलाया गया था, लेकिन वह नहीं आए। अगर आते तो उस वक्त मामले की सही जानकारी जरूर मिल सकती थी। मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली है। सभी साक्ष्य थाने में प्रस्तुत किए गए हैं।
आईएमए अध्यक्ष डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव ने बताया कि अल्ट्रासाउंड जांच से ढेर सारी बीमारियां पकड़ में नहीं आती हैं। इसमें कलर डॉप्लर जैसी जांच भी शामिल है। मेडिकल बोर्ड ने क्या फैसला दिया है, इसकी जानकारी करना जरूरी है। फिर कुछ कहना उचित रहेगा। पूरे मामले की जानकारी लेकर ही आगे का निर्णय लिया जाएगा।
शहर के डॉक्टरों पर अलग-अलग मामलों में पहले भी केस दर्ज हो चुके हैं, लेकिन गर्भावस्था में जांच और गलत रिपोर्ट के लिए कैंट थाने में पहला मामला दर्ज हुआ है। इससे पहले गोरखपुर में इस तरह का मामला सामने नहीं आया था।
जानकारी के अनुसार, डॉक्टर डीपी सिंह के खिलाफ हत्या का केस दर्ज किया गया था। आरोप था कि डॉक्टर ने प्रेमिका व कथित पत्नी की हत्या की थी। गत 16 दिसंबर 2020 को ही आई सर्जन डॉ. प्रमोद कुमार के खिलाफ पत्नी ने केस दर्ज कराया था। 15 अक्तूबर को ऑपरेशन के दौरान पेट में तौलिया छोड़ने पर केस दर्ज कराया गया। अप्रैल 2019 को कोर्ट ने शाहपुर की एक महिला डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही का केस दर्ज करने का आदेश दिया था। नौ अक्तूबर को कैंपियरगंज की एक शिक्षिका ने अपने पति डॉक्टर अंकुर व उसके घरवालों पर दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज कराया था। मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्र, डॉ. कफील अहमद, डॉ. सतीश सहित अन्य के खिलाफ केस हुआ था।