उसी पीएचसी से ब्लड व स्पूटम सैंपल को जिला अस्पताल वापस मंगाया गया। जिला अस्पताल से पीएचसी तक दवा भेजने में केवल आठ मिनट का वक्त लगा। दवा भेजने व सैंपल मंगाने की पूरी प्रक्रिया केवल 26 मिनट में पूरी की गई। जिस पीएचसी पर ड्रोन से दवाएं भेजी गईं, वह लगभग 12000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। ड्रोन ने इसके लिए लगभग 15000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरी।
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जहां यह परीक्षण किया गया, वहां तापमान माइनस 10 डिग्री से लेकर माइनस 15 डिग्री तक था। कीलांग मुख्यालय से थोलांग पीएचसी पर सामान्य दिनों में आने जाने में डेढ़ घंटे का वक्त लगता है। बारिश व बर्फबारी के दौरान 3 से 4 घंटे लग जाते हैं। कई बार सड़क बंद भी हो जाती है, जिसके चलते कई दिन तक लोग परेशान होते हैं।
आरएमआरसी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी ऊंचाई पर बिना सेना की मदद लिए यह पहला अवसर है। इस प्रयोग की सफलता के बाद दुर्गम इलाके में दवा पहुंचाने के काम में और नए प्रयोग किए जाएंगे। इस परीक्षण को डीजी आईसीएमआर डॉ. राजीव बहल ने दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से देखा। इसके अलावा आईसीएमआर के सभी संस्थान भी वर्चुअल जुड़े रहे।
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एसपी कीलांग मयंक चौधरी, डीएफओ स्पीती अनिकेत, मेडिकल ऑफिसर इंचार्ज कीलांग डॉ. अजय ठाकुर व अन्य लोग उपस्थित रहे। परीक्षण सफल होने पर ज्वाइंट सेक्रेटरी डॉ. अनु नागर ने पूरी टीम को बधाई दी। इस दौरान आरएमआरसी गोरखपुर से डॉ. अशोक पांडेय, आईसीएमआर हेडक्वार्टर से डॉ सुमित अग्रवाल और आरएमआरसी कीलांग फील्ड स्टेशन डॉ. तनुजा मिश्रा मौजूद रहीं।
आरएमआरसी वैज्ञानिक डॉ. अशोक पांडेय ने कहा कि पहला प्रयोग सफल होने के बाद अब आरएमआरसी इसका अन्य दुर्गम इलाकों में भी परीक्षण करेगा। हिमाचल की आठ अन्य पीएचसी पर भी दवाएं भेजी जाएंगी। इन पीएचसी की अपने जिला मुख्यालय से दूरी 40-45 किमी तक है। परीक्षण पूरी तरह से सफल होने के बाद इसे मैदानी इलाकों में भी लागू किया जाएगा। इसका सबसे अधिक फायदा उत्तर प्रदेश को होगा। हर साल बाढ़ आने पर कई इलाकों का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट जाता है। ऐसे इलाकों में ड्रोन से दवाएं भेजने में सुविधा होगी।