बैंक पहुंची पुलिस... असल गुनहगार की तलाश, सीए ने इन्कार किया
पुलिस की एक टीम सोमवार को आईसीआईसीआई बैंक भी पहुंची थी। पुलिस उन सभी की भूमिका की जांच कर रही है, जिसके टेबल से होकर चार करोड़ से अधिक रुपये के ऋण की फाइल होकर गुजरी थी। पुलिस उस असल गुनहगार तक पहुंचना चाहती है, जिसने बिना किसी सत्यापन के ही रुद्रांश पांडेय की फर्जी कंपनी को ऋण दे दिया है।
पुलिस बैंक जाकर सबके कामों को देखकर ये तय कर रही है कि किस स्तर से कितनी चूक हुई है, उसे आधार पर दोष तय किया जाएगा। पुलिस ने अपनी जांच तेज कर दी है। उधर, जांच के दायरे में आए सीए ने किसी भी प्रोजेक्ट को तैयार करने से इन्कार कर दिया है। अब सीए के नाम और मुहर का गलत इस्तेमाल हुआ है या सीए झूठ बोल रहे हैं, इसकी जांच पुलिस कर रही है।
इसे भी पढ़ें: दिन में धूप से राहत, शाम को फिर सता रही गलन
2021 में कानपुर में पकड़ा गया था गिरोह
13 अक्तूबर 2021 में कानपुर पुलिस ने भी रुद्रांश पांडेय को गिरफ्तार किया था। तब सामने आया था कि उसने गोरखपुर की फाइनेंस कंपनी गैब ग्राम्य विकास क्रेडिट कोआपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड बनाकर जालसाजी की थी। 100 करोड़ से अधिक की जालसाजी का मामला सामने आने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जांच शुरू कर दी थी। तब ईडी ने प्रदेश के कई जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर कंपनी के संचालकों की संपत्तियों का ब्योरा मांगा था, लेकिन रुद्रांश ने अपना नाम-पता ही बदल लिया। जब पकड़ा गया था तब अपना नाम राजेश और पता गोरखपुर का राप्तीनगर बताया था। लेकिन, असल पता बांसगांव है।
पुलिस की जांच में तब सामने आया था कि राप्तीनगर निवासी राजेश कुमार पांडेय और अष्टभुजा पांडेय ने गैब फाइनेंस कंपनी की शुरुआत की थी। कानपुर के गिरीश शर्मा कंपनी में चीफ जनरल मैनेजर थे। लखनऊ में हेड ऑफिस और अन्य प्रदेशों में इसकी शाखाएं खोली गई थीं। कंपनी भारत सरकार का उपक्रम बताकर धन दोगुना करने के नाम पर लोगों से कई योजनाओं में पैसा जमा करवाती थी। वर्ष 2017 में कंपनी अपने दफ्तर बंदकर भाग गई थी, जिसके बाद मामला खुला था।
इसे भी पढ़ें: एक फरवरी से स्पाइसजेट की सेवाएं दो महीने के लिए बंद, अयोध्या शिफ्ट की गईं तीनों फ्लाइट