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गोरखपुर एम्स में हुआ शोध: गर्भावस्था में बढ़ता मधुमेह...मां-बच्चे में बढ़ा देता है जटिलताओं का खतरा

Mon, 08 Dec 2025 12:34 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो रजनी ओझा, गोरखपुर

सार

एम्स की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता ने कहा कि यदि गर्भावस्था की शुरुआत में ही जोखिम वाली महिलाओं की पहचान हो जाए तो मां और बच्चे दोनों में गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक टाला जा सकता है। बताया कि यह शोध आईसीएमआर के सहयोग से एम्स गोरखपुर आरएमआरसी और मेडिकल कॉलेज की तरफ से संयुक्त रूप से किया जा रहा है।
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एम्स की कार्यकारी निदेशक विभा दत्ता - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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गर्भावस्था में मधुमेह से मां और बच्चे दोनों में अनेक गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। एम्स के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने इसे लेकर एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना शुरू की है। गर्भावस्था के दौरान तनाव और उच्च कैलोरी वाले भोजन की वजह से होने वाला मधुमेह, (गेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस या जीडीएम) तेजी से बढ़ रहा है।
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अगर गर्भावस्था के दौरान मधुमेह नियंत्रण न किया जाय तो डायबेटिक कीटोएसिडोसिस ( शरीर में इंसुलीन कम होना) जैसी गंभीर अवस्था विकसित हो सकती है। इससे भ्रूण मृत्यु की भी संभावना बढ़ जाती है। 

एम्स की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता ने कहा कि यदि गर्भावस्था की शुरुआत में ही जोखिम वाली महिलाओं की पहचान हो जाए तो मां और बच्चे दोनों में गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक टाला जा सकता है। बताया कि यह शोध आईसीएमआर के सहयोग से एम्स गोरखपुर आरएमआरसी और मेडिकल कॉलेज की तरफ से संयुक्त रूप से किया जा रहा है। इसके पहले अध्ययन में पहली तिमाही में पंजीकृत गर्भवती

महिलाओं को शामिल किया जा रहा है। इसमें इनके स्वास्थ्य स्थिति, पारिवारिक इतिहास, जीवनशैली और खानपान की आदतों की जानकारी जुटाई जाएगी। इसके अलावा रक्त के नमूना में कुछ नए बायोमार्कर्स ( अनुवांशिक या जैविक चिन्ह) का स्तर मापा जा रहा है। इससे शुरू में ही एक अंदाजा लग जाएगा कि उनमें मधुमेह की संभावना है या नहीं?

गोरखपुर एम्स - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि मधुमेह की पहचान के लिए 75 ग्राम ग्लूकोज़ वाला ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) मानक परीक्षण माना जाता है। इस जांच में महिला का रक्त तीन बार (खाली पेट, ग्लूकोज पीने के एक घंटे और दो घंटे बाद) जांचा जाता है और किसी भी सैंपल के असामान्य होने पर ग्लूकोज़ चयापचय (ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म) में गड़बड़ी मानी जाती है।

यह परीक्षण आमतौर पर 24 सप्ताह पर किया जाता है और इसे 32 सप्ताह पर दोहराया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि गर्भावस्था में उनमें मधुमेह विकसित हो रहा है या नहीं।

एम्स से इस शोध में शामिल सह अन्वेषक डॉ. शिखा सेठ ने बताया कि हालांकि गेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस (जीडीएम) के अधिकांश महिलाओं में प्रसव के बाद, शुगर नियंत्रण सामान्य हो जाता है, फिर भी उनमें आगे चलकर कम उम्र में डायबिटीज होने का जोखिम बना रहता है।

इसलिए जीवनशैली में सुधार, संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और तनाव नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। बताया कि नियमित और सरल भोजन, ताज़े फल और सलाद, कम तेल में पका हुआ भोजन, साथ ही नट्स, बीन्स, दालें और साबुत अनाज जैसे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं और रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने में सहायक होते हैं।
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गर्भावधि मधुमेह में सप्ताह में दो बार होगी जांच
डॉ. शिखा सेठ ने बताया कि एम्स की प्रसूति एवं स्त्रीरोग विभाग में गर्भावधि मधुमेह (जीडीएम) से पीड़ित महिलाओं के लिए सप्ताह में दो बार विशेष 'डायबेटिक क्लिनिक' संचालित किया जा रहा है, जिससे गर्भावस्था के दौरान बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित किए जा सके।

वहीं, एम्स के डायबिटीज़ इन प्रेग्नेंसी क्लिनिक की नोडल अधिकारी एवं अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. अराधना सिंह ने बताया कि एम्स की ये क्लिनिक उन महिलाओं को विशेष बहु-विषयक देखभाल प्रदान करती है, जिन्हें गर्भावस्था से पहले ही टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटीज़ होती है, साथ ही उन महिलाओं की भी देखभाल की जाती है जिनमें गर्भावस्था के दौरान गेस्टेशनल डायबिटीज़ (जीडीएम) विकसित हो जाती है।
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