मां धूमावती। (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला।
ज्येष्ठ मास की अष्टमी तिथि शुक्रवार यानी आज मां धूमावती की जयंती मनाई जा रही है। विशेष साधक धूमावती माता की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया जा रहा है। पंडित शरद चंद्र मिश्रा ने बताया कि मृत्यु की देवी कहलाई जाने वाली धूमावती देवी का निवास श्मशान में माना जाता है और इनका वाहन कौआ है। धूम्र वर्ण के कारण इन्हें धूमावती कहा जाता है।
ये वृद्धा एवं विधवा के रुप में दिखती हैं। तंत्र में इन्हें महान शिक्षिका एवं ब्रह्मांड संबंधी रहस्यों को जानने वाली देवी माना जाता है। इनकी साधना सामान्य साधक को नहीं करनी चाहिए। योग्य गुरू से दीक्षा लेकर उनके संरक्षण में ही इनकी साधना करनी चाहिए। साधक को इनकी साधना से कई दिव्य और मायावी विद्याओं में सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसी विद्याओं को कारण साधक अंत में मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है।
ऐसे हुई थी धूमावती माता की उत्पत्ति
पंडित अवधेश मिश्रा के अनुसार, सती के पिता राजा दक्ष अपने दामाद भगवान शंकर के प्रति सदभाव नहीं रखते थे। ऐसे में जब उन्होंने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तो उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। बावजूद इसके सती की इच्छा अपने मायके जाने की थी। जब इसके लिए उन्होंने भगवान शिव से अनुमति मांगी तो भगवान शिव ने कहा कि जहां मान-सम्मान न हो, वहां नही जाना चाहिए।
वास्तव में देवी सती अपने पिता दक्ष के अपमान से कुपित थी। महादेव के मना करने पर वे यज्ञ मे जाकर यज्ञ को नष्ट करने की बात करते हुए भयानक रूप में आ गई। उस भयानक देवी ने अपने शरीर से दस देवियों को प्रकट कर उन्हें दसों दिशाओं में शिव का मार्ग रोकने का आदेश दिया।
भगवान शिव ने देवी सती से उन दस देवियों का परिचय पूछा, तो उन्होंने अपनी दस महाविद्याओं का एक-एक कर परिचय दिया। इस दौरान उन्होंने देवी धूमावती के बारे में परिचय देते हुए कहा कि आपके अग्निकोण में जो विधवा रूप में महेश्वरी हैं, वे महाविद्या धूमावती हैं।