डॉ. वागीश ने बताया कि इस संयंत्र के जरिए सूर्य पर हर समय नजर रखने में कोई भी बाधा नहीं आएगी, यहां तक कि सूर्य ग्रहण के दौरान भी आसानी से निगरानी की जा सकेगी। यह पहला मिशन है, जो सूर्य की परिधि (कोरोना) के अंदरूनी हिस्से को करीब से देखेगा। आदित्य-एल1 अंतरिक्ष मिशन का लक्ष्य सूरज के गतिविधियों को समझकर अंतरिक्ष मौसम का जानकारी प्राप्त करना है। आदित्य-एल-1 पर कुल सात संयंत्र हैं, जिसमें मुख्य विजिबल इमिसन लाइन कोरोनाग्राफ़ (वीईएलसी ) है, जो इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स, बंगलूरू में तैयार किया गया है।
भारतीय ताराभौतिकी संस्था, बंगलूरू में तैनाती से पूर्व डॉ. वागीश मिश्रा जर्मनी में स्थित विश्व प्रसिद्ध मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फाॅर सोलर सिस्टम रिसर्च में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो के रूप में कार्यरत थे। जर्मनी जाने से पहले भी वह चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस से पोस्ट-डॉक्टरल फेलोशिप लेकर चीन में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इसके साथ ही अमेरिका में स्थित जॉर्ज मैसन यूनिवर्सिटी वर्जीनिया में जाकर भी शोध कार्य किए हैं। भारत में इसरो के आदित्य एल 1 प्रोजेक्ट की जानकारी होने पर वह अपनी सेवा देने स्वदेश चले आए।
भारत के पहले अंतरिक्ष मिशन आदित्य-एल-1 जैसे प्रोजेक्ट में काम करके वागीश बेहद खुश हैं। वह इस मिशन के नए प्रेक्षणों के विश्लेषण से नई खोज करने के लिए उत्साहित हैं। उन्होंने अपनी इस सफलता के लिए गोविवि भौतिकी विभाग के प्रो. शान्तनु रस्तोगी, सुग्रीव तिवारी, उमाशंकर पांडेय और रविशंकर सिंह से मिले मार्गदर्शन के लिए आभार जताया है।