कवि व आलोचक प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव आपत्तियों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2014 में ही मैंने लोक साहित्य पर अपना व्याख्यान दिया था।
हिंदी विभाग विभागाध्यक्ष के प्रो. दीपक त्यागी ने कहा कि लोक साहित्य में उन्हीं लेखक व साहित्यकारों के उपन्यास व नाटक को शामिल किया गया है, जिनकी बाजार में मांग ज्यादा है। ऐसे लोगों के बारे में नई पीढ़ी को जानना ही चाहिए।
साहित्यकार आनंद पांडेय ने कहा कि नाटक और उपन्यास को पाठ्यक्रम में शामिल करने से मूल साहित्य में क्षरण होगा। बेहतर होता कि एक ही पाठ्यक्रम में मुंशी प्रेमचंद, निराला, पंत के साथ वेद प्रकाश शर्मा और गुलशन नंदा के नाटक को भी रखा जाए। छात्र कुछ समझ सकेंगे कि प्रेमचंद और निराला का साहित्य क्यों बेहतर है?