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Gorakhpur News: हिंदी के नए पाठ्यक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस, तर्क देकर जताई आपत्ति

Wed, 05 Apr 2023 02:46 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो गोरखपुर।

सार

लोकप्रिय साहित्य पर हिंदी विभाग के प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने इस पर टिप्पणी की। इसके बाद विभाग प्रो. अनिल राय ने भी अपने फेसबुक लेखिका कात्यायनी के एक पोस्ट को साझा करके विरोध करने वाली लोगों को नसीहत दी।
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DDU Gorakhpur - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में लोक साहित्य के नाम से नए पाठ्यक्रम शुरू करने पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कुछ साहित्यकारों ने वेद प्रकाश शर्मा का चर्चित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा, जासूसी साहित्य के जनक इब्ने सफी की रचनाएं, रोमांच भरने वाले गुलशन नंदा के उपन्यास नीलकंठ आदि को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर आपत्ति जताई है। जबकि, विश्वविद्यालय के आचार्यों एवं कुछ साहित्यकारों ने इसे समय की मांग बताई है।

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दरअसल, इसकी शुरुआत विश्वविद्यालय से ही हुई। लोकप्रिय साहित्य पर हिंदी विभाग के प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने इस पर टिप्पणी की। इसके बाद विभाग प्रो. अनिल राय ने भी अपने फेसबुक लेखिका कात्यायनी के एक पोस्ट को साझा करके विरोध करने वाली लोगों को नसीहत दी।

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लेखक वीरेंद्र यादव ने अपने पोस्ट में लिखा है कि गुनाहों का देवता, चित्रलेखा और शिवानी का लेखन अब लोकप्रियता के पायदानों से नीचे लुढ़क गया है। वहीं, प्रभात राजपूत का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में लोकप्रिय साहित्य बहुत पहले से पढ़ाया जा रहा है। संजय आर्या लिखते हैं, आजादी के बाद से यूं बदला परिवेश, गुलशन नंदा हो गया, प्रेमचंद का देश।
 

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कवि व आलोचक प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव आपत्तियों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2014 में ही मैंने लोक साहित्य पर अपना व्याख्यान दिया था।

हिंदी विभाग विभागाध्यक्ष के प्रो. दीपक त्यागी ने कहा कि लोक साहित्य में उन्हीं लेखक व साहित्यकारों के उपन्यास व नाटक को शामिल किया गया है, जिनकी बाजार में मांग ज्यादा है। ऐसे लोगों के बारे में नई पीढ़ी को जानना ही चाहिए।

साहित्यकार आनंद पांडेय ने कहा कि नाटक और उपन्यास को पाठ्यक्रम में शामिल करने से मूल साहित्य में क्षरण होगा। बेहतर होता कि एक ही पाठ्यक्रम में मुंशी प्रेमचंद, निराला, पंत के साथ वेद प्रकाश शर्मा और गुलशन नंदा के नाटक को भी रखा जाए। छात्र कुछ समझ सकेंगे कि प्रेमचंद और निराला का साहित्य क्यों बेहतर है?


 
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