23 नवंबर 2004 की रात पुलिस की बीस रुपये की लालच ने तीन परिवारों को न्याय के लिए तरसा दिया। सुनने में थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा होगा, मगर यह पुलिस की वसूली की सच्चाई है। दरअसल, बेलीपार इलाके के मामापार गांव में 23 नवंबर की रात तीन भेड़ पालकों की चाकू घोंपकर हत्या कर तीन सौ भेड़ बदमाश हांक ले गए थे।
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रास्ते में नौसड़ के पास पुलिस ने चेकिंग के नाम पर रोका था, लेकिन तब बीस रुपये में लेकर ही पुलिस ने ट्रक चालकों को जांच पड़ताल के बिना छोड़ दिया। सुबह जब इसकी जानकारी पुलिस को हुई तो उनके पांव तले जमीन ही खिसक गई। आनन फानन पुलिस अफसर पहुंचे, जांच में दोषी सिपाहियों पर कार्रवाई भी हुई, लेकिन आज तक उस घटना के बदमाश नहीं पकड़े जा सके।
तीन भेड़ पालकों की हुई थी हत्या
मामापार गांव के केशव, रामजीत और रामअवध की हत्या कर दी गई थी। तीनों के हाथ पांव बांधकर चाकू से वार किए गए थे और फिर खेत में फेंक दिया गया था। अगली सुबह गांव वालों को इसकी जानकारी हो सकी थी। उन्होंने इस पर विरोध भी जताया था, लेकिन कुछ हासिल नहीं हो सका। पुलिस के तमाम अफसर आश्वासन देने पहुंचे थे, मगर बदमाश को पकड़ने की कौन कहे आज तक पहचान तक नहीं हो सकी।
जाम लगाने पर सरकारी मदद का आश्वासन भी पूरा नहीं
बीस रुपये के लालच में तीन परिवारों को जहां आज तक न्याय नहीं मिल सका। वहीं, उनके परिवार वाले बताते हैं कि जाम लगाकर कार्रवाई की मांग करने पर तमाम अफसर आए थे। सरकारी मदद का दावा भी किया गया था, मगर बाद में मामला शांत होने पर कुछ भी नहीं दिया गया। किसी तरह से इन पीड़ित परिवारों के पास बस दो जून की रोटी की सुविधा ही बमुश्किल जुट पाई है।
ना भेड़ मिलेे, ना कोई अन्य मदद
घटना को बहुत साल गुजर गए। पहले थाने पर घरवाले जाते भी थे, लेकिन फिर कोई पूछने वाला नहीं मिला। ना ही भेड़ मिले ना ही कोई अन्य मदद मिल सकी।
विद्यावती, केशव की पत्नी
कातिल भी नहीं पकड़े गए
पुलिस वाले खाली यही कहते थे कि बाहर पुलिस टीम गई है, मगर कातिल नहीं पकड़ पाए। किसने मारा, कहां के थे यह कोई नहीं जानता है। पुलिस की ही लापरवाही थी।
गुलइचा देवी, रामजीत पाल की पत्नी
घटना के समय गांव वालों ने सड़क जाम की थी, तब अफसर आकर बहुत वादा करके गए थे, लेकिन बाद में कोई आर्थिक मदद नहीं मिल सकी। बदमाश भी नहीं पकड़ पाए।
चानमती देवी, राम अवध की पत्नी
आरोपित पुलिस वालों पर भी ठीक से नहीं हो सकी थी कार्रवाई
इस घटना के पीछे कुछ पुलिस वाले पूरी तरह से दोषी थे। जांच में मामला सामने आया मुद्दा भी बना मगर अफसरों ने बड़े सलीके से इसे दबा दिया। तब जाम लगाए लोगों को मुआवजा दिलाने के नाम पर चुप करा दिया गया और बाद में पुलिस की बदनामी ना हो इस वजह से इस मुद्दे को ही दबा दिया गया। पुलिस वालों को कुछ दिन के लिए पुलिस लाइंस जरूर भेजा गया था मगर फिर तब नौसड़ के टक्कर की ही चौकी ट्रांसपोर्ट नगर में उनकी तैनाती कर दी गई थी। कुल मिलाकर इस मामले में ना तो पुलिस कातिलों को पकड़ी थी और ना ही दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई हो सकी थी।