एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, जो ज्यादा लंबा लॉकडाउन हो गया। मुंबई में किसी के घर में मार्च-अप्रैल में बूढ़े पिता को आसरा तो मिला लेकिन महामारी में बूढ़े पिता को जीवन मिलेगा या नहीं या फिर महामारी कम होगी या नहीं, इस पर विचार करते हुए फैसला लिया गया कि पिताजी को बचाना है।
टाटा के डॉक्टर की ओर से बनाए गए सर्टिफिकेट और प्रशासन का सर्टिफिकेट लेकर 28 अप्रैल को मुंबई से चला और 30 अप्रैल को गोरखपुर आ गया। पुलिस प्रशासन की देखरेख में पूरा परिवार क्वारंटीन है। हम सभी लोग नियम का पालन कर रहे हैं।
मेरा दुर्भाग्य की मुंबई से गोरखपुर के सफर में तोहफा स्वरूप पॉजिटिव मिला। मेरे परिवार और मैंने अपने जन्मदाता के लिए जो किया, वो भी कम है। मुंबई में खाए-पिए बिना टूट चुके थे, सोचा घर में कमी पूरी होगी।
पर क्या पता था कि यहां आने के बाद ढाक के तीन पात जैसी स्थिति होगी। 57-58 हजार रुपये देकर ये तोहफा मुंबई से गोरखपुर तो न लाता, तो शायद इतना महंगा तोहफा दुर्भाग्य या भाग्यवश मुझे न मिलता। मुझे कुबूल है...ऐ भाग्य तेरी हर खुदाई मंजूर मुझे, दो वक्त तो ठहर जा ताकि दो डोली और एक अर्थी को रूखसत कर सकूं।
(यह लेख कोरोना पॉजिटिव बेटे के फेसबुक से लिया गया है)