गोरखपुर विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने कोरोना वायरस से बचाव के लिए जागरूकता गीत, गजल और कविताएं लिखकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हैं। इन रचनाओं को काफी सराहा जा रहा है। कई प्रोफेसरों की कविताएं विवि के फेसबुक पेज पर भी अपलोड की गई हैं। हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. कमलेश कुमार गुप्त ने लिखा-इस कोरोना के समय में घर में रहिए साफ, छोटी-मोटी गलतियां करते रहिए माफ और छुआछूत के रोग में ना हों लापरवाह, घर में रह पूरी करें, शेष रही कुछ चाह।
संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने संस्कृत में लिखा- ‘कोरोना नामं जीवनघातिनी विपदा सामायता, कथं शमनं भवत्यस्या भगवत: प्रार्थना ह्येषा। उन्होंने लोगों से एकजुट होकर कोरोना को हराने का आह्वान किया है। समाजशास्त्र विभाग की प्रो. संगीता पांडे ने लिखा है, ‘है मानवता पर संकट भारी, कोरोना से हमारी जंग है जारी’।
अर्थशास्त्र के सहायक आचार्य एवं कवि डॉ. शरद चंद्र श्रीवास्तव ने ‘ये पलायन है या विस्थापन, तुम जा कहां रहे हो, ये हवाएं ये धरती पू्छ रही हैं, तनिक थम जाओ’ लिखकर समस्या, मजदूरों के पलायन और गांव के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी ने लिखा, ‘मेरे बाबू भैया बाहर न जाना, कोरोना को है इस देश से भागना’। समाजशास्त्र विभाग के डॉ. मनीष पांडे ने कविता से इतर ‘जनता कर्फ्यू’ नाम से लघु कहानी का दो भाग भी कोरोना के कारण उत्पन्न हुई सामयिक परिस्थितियों को लेकर लिखा है।
राजनीति विज्ञान के छात्र अतुल मिश्र ने कोरोना से युद्ध, अंग्रेजी विभाग के सिद्धार्थ गौतम, रसायन विज्ञान विभाग के आदित्य श्रीवास्तव, एमए हिंदी के छात्र भीमसेन सिंह उज्ज्वल ने भी कोरोना पर कविताएं लिखी हैं। कुलपति प्रो. वीके सिंह ने लॉकडाउन में शिक्षकों के इस प्रयास की सराहना की है। मीडिया प्रभारी प्रो. अजय कुमार शुक्ला ने कहा कि विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षकों की इन रचनाओं को सबके सामने लाया जाएगा। जल्द ही सभी कंटेंट विवि के सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड किए जाएंगे।