गोलघर स्थित विजय इलेक्ट्रिक स्टोर के राजेश चंद्र कौशिक ने बताया कि हमारे लिए देश पहले, व्यापार उसके बाद है। प्रत्येक वर्ष चीन की झालरों की भारी डिमांड आती है। दीवाली के चार से पांच महीने पहले इनका स्टाक आना शुरू हो जाता है। इस बार कोरोना की वजह से काफी स्टाक नहीं आ पाया और चीन के इस गंदी हरकत से उत्पाद क्या मंगाएंगे, इसके नाम से ही नफरत होने लगी है।
दीवाली पर चीनी झालर एकदम नहीं बेचेंगे। सेना के जवानों के साथ देश के नागरिकों का भी फर्ज है, अपने स्तर से चीन को जवाब दें। चीन की झालर सस्ती होती हैं, इसलिए इनकी पूछ अधिक है। दीवाली में कई करोड़ का व्यापार होता है। इस बार विरोध में माल ही नहीं आएगा तो कोई बेचेगा ही नहीं।
भारतीय खिलौने ही खरीदें, चिपकाएंगे नोटिस
गोलघर स्थित लवली गिफ्ट के मनीष विश्वकर्मा ने बताया कि भारतीय खिलौनों की पूछ अधिक होती है। पर जब इलेक्ट्रिक खिलौने की बात आती है तो सस्ता होने की वजह से चीन के खिलौने लोग खरीदते हैं। दो दिन बार दुकान खोलेंगे तो बाहर नोटिस लगा देंगे कृपया भारतीय खिलौने ही दुकान से खरीदें।
परिवार के साथ देश भी हमारा अपना है। इसकी जिम्मेदारी भी हमारी है। दुकान से कुछ और सामान बेच लेंगे लेकिन चीन का सामान नहीं बेचेंगे। भारतीय साइकिल, ट्वाय, गुड्डा गुड़िया के अलावा अन्य खिलौने हैं, ग्राहक भी इन्हें ही खरीदें। हर महीने लगभग 30 लाख रुपये का इनका बाजार है। साल में लगभग 3.6 करोड़ रुपये का इनका बाजार होता है।
चीन के आर्थिक बहिष्कार की मुहिम तेज हो गई है। न सिर्फ जन साधारण बल्कि कई सेलिब्रेटी भी चीन के उत्पादों का पूरी तरह से बहिष्कार करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर यह कितना संभव हो पाएगा, यह आने वाले समय में तय होगा। क्योंकि स्मार्टफोन, गैजेट से लेकर बेडरूम और किचन तक जरूरत के हर सामान में चीन की ‘घुसपैठ’ हो चुकी है। वहीं बाजार चीन निर्मित इंटीरियर लाइट्स, फैंसी लाइट्स, सेलफोन, रेशम, आर्टिफिशियल लेदर से पटे हुए हैं।
भारतीय बाजार में स्मार्टफोन, गैजेट और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में चीन की कंपनियों का माल छाया हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में कुल स्मार्टफोन मार्केट में अकेले चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ज्यादा है। इसी तरह टीवी-इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में भी चीन की अच्छी खासी घुसपैठ है।
विकल्प की तलाश करेंगे देश के नागरिक
यह सारा चीन के रुख निर्भर करता है। अगर देश के सैनिकों को अब थोड़ा सा भी नुकसान होगा तो इसका अंजाम चीन को न सिर्फ सामरिक बल्कि आर्थिक रूप से भी भुगतना होगा। निश्चित तौर पर अभी भारतीय बाजार पर चीन का आधिपत्य है, लेकिन देश का लोग चीन का विकल्प ढूंढ लेंगे। चीन के विरोधी देश हांगकांग और ताइवान भी इलेक्ट्रानिक्स के मामले में कई बेहतर उत्पाद तैयार करते हैं।
यहां के आयातक चीन को छोड़कर अन्य देशों से आयात करना शुरू कर देंगे। सभी देशों को भी बाजार की तलाश है। वहीं निश्चित तौर पर चीन के बहिष्कार का भारत पर ज्यादा असर होगा, लेकिन भारत के लिए बेहतर स्थिति तब होगी जब वो चीन के अनुपात में स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक और गैजेट में प्रतिस्पर्धी निवेश लेकर आए या इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी निर्माण को बढ़ावा दे। भारत के लिए जापान, ताइवान और साउथ कोरिया निवेश के लिए चीन के मुक़ाबले बेहतर सहयोगी हो सकते हैं।
डॉ. संजीत कुमार गुप्ता, शिक्षक वाणिज्य, गोरखपुर विश्वविद्यालय
देश- ब्रांड
चीन- जियोमी, रेडमी, एमआई, विवो, रियल-मी, ओप्पो, वन-प्लस, लिनोवो, मोटोरोला, मिजू, कूल-पैड, हुआई, ऑनर, इनफिनिक्स
भारत- जियो, आईबॉल, सेलकॉन, इंटेक्स, कार्बन, लावा, एचसीएल, माइक्रोमैक्स, ओनिडा, वीडियोकॉन
नीदरलैंडर- फिलिप्स
फिनलैंड- नोकिया
जापान- सैनसुई, पैनासोनिक, शार्प, सोनी, तोशिबा
दक्षिण कोरिया- एलजी, सैमसंग
ताइवान- असुस, बेनक्यू, एचटीसी
अमेरिका- एप्पल, गूगल, एचपी, इनफोकस
चीन का पैंतरा, मेड इन चाइना की जगह मेड इन पीआरसी
गोरखपुर। चीन के प्रति भारतीय जनमानस के विरोध को देखते हुए चीन ने भी पैंतरा बदल लिया है। अब चीन में निर्मित सामानों पर मेड इन चाइना की जगह मेड इन पीआरसी (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) लिखना शुरू कर दिया है। ताकि लोगों को यह पता नहीं चल सके कि उत्पाद चीन में बना हुआ है।