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Gorakhpur News: गोरखपुर में बेबसों की जिंदगी लील रहा 'सूदखोरी' का धंधा, कई परिवार हो चुके हैं खत्म

Tue, 07 Feb 2023 01:38 PM IST
vivek shukla शिवम सिंह, गोरखपुर।

सार

प्रशासन ने बाकायदा नियमों में बांधकर उन्हें लाइसेंस दिया है कि वे कर्जदार से साल में अधिक 14 फीसदी ही सूद वसूल सकते हैं। हालांकि सूद का वैध-अवैध धंधा करने वालों की संख्या 1000 से अधिक है। आश्चर्यजनक यह है कि सूद के कारोबारी गांव में लोगों की बेबसी का फायदा उठाकर 3 से 10 फीसदी मासिक सूद पर कर्ज बांट दे देते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सूदखोरी का धंधा आर्थिक कमजोर और बेबसों की जिंदगी लील रहा है, लेकिन इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। सूदखोर जरुरतमंदों को दस फीसदी मासिक ब्याज पर कर्ज देते है और पूरे साल दबंगई कर उनसे वसूली करते हैं। जबकि नियमानुसार सूद पर रुपये देने के लिए लाइसेंस लेना होता है। इसके लिए प्रशासन के पास महज दस लोगों ने ही अपना रजिस्ट्रेशन कराया है, लेकिन हर गली में तीन से चार सूदखोर मौजूद है, जो अपना धंधा चला रहे और फंसने वाले लोग आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जा रहे हैं।

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जानकारी के मुताबिक, सूदखोर से रुपये लेने के बाद  मूल रकम का 36 से 100 फीसदी तक ब्याज अदा करना पड़ जाता है। सूदखोरों ने अकूत और अवैध कमाई में बाधा न आए इसके लिए बाकायदा मनबढ़ युवकों को पाल रखा है। उन पर भारी रकम खर्च करते हैं और कर्जदारों को उन्हीं के जरिए डराते-धमकाते हैं। सूद का कारोबार करने के लिए यूं तो जिले में महज दस लोगों ने प्रशासन से लाइसेंस ले रखा है।

प्रशासन ने बाकायदा नियमों में बांधकर उन्हें लाइसेंस दिया है कि वे कर्जदार से साल में अधिक 14 फीसदी ही सूद वसूल सकते हैं। हालांकि सूद का वैध-अवैध धंधा करने वालों की संख्या 1000 से अधिक है। आश्चर्यजनक यह है कि सूद के कारोबारी गांव में लोगों की बेबसी का फायदा उठाकर 3 से 10 फीसदी मासिक सूद पर कर्ज बांट दे देते हैं। एक बार कर्ज में फंसा व्यक्ति वर्षों से तक उबर नहीं पाता है। कुछ की तो पीढ़ियां कर्जदार बनी रह जाती हैं।
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दबंगों पर खूब खर्च करते हैं सूदखोर

सूदखोरों ने बाकायदे अपने साथ मनबढ़ युवकों को रख लिया है। वे उन्हें महीने में अच्छी-खासी रकम देते हैं। उनका खर्च भी उठाते हैं। रुपये वसूलने के लिए मनबढ़ मुस्टंडे कर्जदार से जोर-जबरदस्ती करते हैं। उनके परिवारीजनों को डराते-धमकाते हैं।

तीन साल पहले थे 200, लेकिन वर्तमान में सिर्फ दस लाइसेंसी
तीन साल पहले तक 200 सूदखोर रजिस्टर्ड थे, लेकिन अब एडीएम फाइनेंस के दफ्तर में सिर्फ दस ही रजिस्टर्ड साहूकार हैं। बाकी ने नवीनीकरण नहीं काया है। नियमानुसार साहूकारी में तीन साल के लिए रजिस्ट्रेशन होता है, जिसकी फीस हर साल 20 रुपये के हिसाब से 60 रुपए लगती है। हर तीन साल पर नवीनीकरण कराना जरूरी होता है।

ये है नियम
उत्तर प्रदेश साहूकारी अधिनियम 1976 के मुताबिक, साहूकारी के लिए लाइसेंस लेना जरुरी है। इसके तहत साहूकार प्रतिभूत ऋण यानी कोई वस्तु गिरवी रखकर लिए गए रुपये पर 12 से 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज वसूल सकते हैं।

 
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अब खोजे नहीं मिल रहे सूदखोर, जागी पुलिस तो जुआ बंद

गोला में एक ही परिवार की चार लोगों की मौत के बाद से गांव व आसपास से सूदखोर फरार हो गए है। जुआ का अड्डा भी बंद पड़ा है। घटना के बाद पुलिस जागी है तो सक्रियता नजर आने लगी है। हालांकि, यही सक्रियता अगर रोज रहती तो न तो सूदखोर नजर आते और न ही जुआ का खेल होता है। शायद इंद्र बहादुर का परिवार भी इस दलदल में फंसकर पूरे परिवार को नहीं उजाड़ता।

केस एक
06 फरवरी 2018 को इसी देवकली गांव के निवासी ऋतुराज शर्मा ने भी अपने दो बेटियों को फंदे से लटकाकर फिर खुदकुशी की थी। वह भी कर्ज लेकर सूदखोरों से परेशान था और गांव छोड़कर गोरखनाथ इलाके के पचपेड़वा में अपने परिवार के साथ रहता था। गांव के सूदखोर वहां भी परेशान करते थे। इसके बाद ही उसने बेटी नैना (4) और निरुपमा (3) को फंदे पर लटकाने के बाद खुदकुशी कर ली थी। ऋतुराज के पिता रमेश शर्मा देवकली गांव में ही रहते हैं।

केस दो
चार फरवरी 2019 को राजघाट इलाके में गल्ला व्यापारी रमेश गुप्ता ने पत्नी सरिता, बेटी पायल, रचना और बेअे आयुष को जहर देकर मार दिया और फिर खुद ट्रेन के आगे कूदकर खुदकुशी कर लिए थे। उस समय एक बेटी अस्पताल में दो दिन तक जिंदा भी थी, जिसने सूदखोरों के बारे में पुलिस को जानकारी दी थी। पुलिस ने तब केस दर्ज कर कार्रवाई भी की थी, लेकिन बाद में फिर सूदखोरों को भूल गई।
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