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ब्लैक फंगस: कोरोना की तुलना में काफी महंगा है ब्लैक फंगस का इलाज, विशेषज्ञ के अनुसार इन रोगियों को खतरा ज्यादा

Mon, 17 May 2021 10:37 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

ब्लैक फंगस का लक्षण दिखे तो तत्काल करें डॉक्टरों से संपर्क। संक्रमण से मुक्ति पा चुके मरीजों को सफाई पर ध्यान देना बेहद जरूरी। ब्लैक फंगस में सूख जाती है रक्त वाहिका। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : istock
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विस्तार
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कोरोना संक्रमण से उबर चुके लोगों में ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह से शासन से लेकर विभाग तक के लोग परेशान हैं। वहीं कोरोना की तुलना में इसका इलाज काफी महंगा है। अगर समय से इलाज नहीं हुआ तो इस बीमारी में जान भी जा सकती है। बीमारी में मरीज को एम्फोटेरेसिन इंजेक्शन दिन में कई बार लगाया जाता है और यह 21 दिन तक लगातार लगवाना होता है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि अगर लक्षण दिखे तो तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें। वरना जरा सी लापरवाही जान ले सकती है।
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मुख एवं दंत रोग विशेषज्ञ डॉ मोनिका मिश्रा ने बताया कि ब्लैक फंगस की एंट्री मरीज के शरीर में नाक या मुंह के जरिए ही होती है। मुंह में फंगस का संक्रमण ऊपरी जबड़े से होता है। इसे मैक्सिला कहते हैं। मैक्सिला में खून की धमनियों में सबसे पहले यह फंगस आता है। यह खून की धमनियों के साथ ही दांत और जबड़े की हड्डियों को गलाने लगता है। बताया कि इसे पहचानने के तरीके सरल हैं। कोविड से उबरे मरीजों को मुंह के जबड़े की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। यह जबड़े में काले रंग के दाग की तरह दिखता है। इसकी वजह से दांत गलने लगते हैं। दांतों में दर्द शुरू हो जाता है। मसूड़ों में सूजन के साथ काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं।
 
जबड़े से करता है नाक, गला और दिमाग में प्रवेश
डॉ मोनिका मिश्रा ने बताया कि जबड़ें में लंबे समय संक्रमण रूकता नहीं है। जबड़े से नाक, गला व दिमाग की धमनिया जुड़ीं हैं। इसकी वजह से फंगस जबड़े से होता हुआ नाक और उसके बाद आंख और दिमाग में प्रवेश करता है। इसके बाद नाक और आंख में संक्रमण पहुंच जाता है। इतना ही नहीं यह संक्रमण से दिमाग पर बुरा असर पड़ता है।  
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30 से 40 हजार रुपये का खर्चा है रोजाना 

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ रामकुमार जायसवाल ने बताया कि अस्पतालों में साफ-सफाई न होने की वजह से ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ रहा है। इसके शिकार में भर्ती मरीजों की संख्या सबसे अधिक है। इस बीमारी से निजात के लिए साफ-सफाई बेहद जरूरी है। मरीज को यदि ऑक्सीजन लगा है तो पाइप, मास्क को बदला जाए। कोरोना बीमारी में जो दवाएं चल रही है, डॉक्टर की ही सलाह पर बंद किया जाए। स्टेरॉयड का इस्तेमाल केवल डॉक्टर के ही सलाह पर किया जाए।
 
ब्लैक फंगस के मरीजों के इलाज पर करीब 30 से 40 हजार रुपये का खर्चा आता है। संक्रमण अगर सही समय पर पता चल जाए तो सायनस की सर्जरी से इसे ठीक किया जा सकता है। इसमें करीब तीन लाख रुपये खर्च होते हैं। लेकिन अगर पहला स्टेज पार हो जाए तो यह लागत बढ़कर पांच से दस लाख तक पहुंच जाती है। इसमें ब्रेन और आंखों की सर्जरी करनी पड़ती है। जबकि कोरोना के सामान्य मरीज के इलाज का औसत खर्च दस से 15 हजार रुपये है।
 
एक मरीज की हो चुकी है मौत, 24 से अधिक मरीज अब तक मिल चुके
कोरोना संक्रमण से मुक्ति पा चुके 24 से अधिक मरीजों में ब्लैक फंगस के लक्षण मिल चुके हैं। इनमें दो मरीजों को बीआरडी में लक्षण मिले हैं। जबकि दो मरीज शहर के दो अलग-अलग निजी अस्पतालों में भर्ती है। इसके अलावा 20 से अधिक मरीज ने ब्लैक फंगस के लक्षण मिलने की शिकायत शहर के एक निजी चिकित्सक से की है। चिकित्सक की सलाह पर मरीजों का इलाज भी चल रहा है। इन मरीजों में सपा के एक पूर्व पार्षद भी शामिल हैं। इसके अलावा तारामंडल का भी एक मरीज शामिल हैं। वहीं शहर के एक मरीज की मौत लखनऊ के एक निजी अस्पताल में हो चुकी हैं।
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साठ किलो के मरीजों को लगती है साठ डोज

ब्लैक फंगस के मरीज को वजन के हिसाब से डोज दिया जाता है। यदि मरीज 60 किलो का है तो उसे इंजेक्शन के 60 डोज देने पड़ते हैं। मौजूदा समय में एक इंजेक्शन की कीमत करीब सात हजार के रुपये के आसपास है। इसके अलावा ऑक्सीजन का खर्च अलग है।
 
लक्षण
नाक में दर्द, खून आए या नाक बंद हो जाए। नाक में सूजन आ जाएं, दांत के जबड़े में दर्द या काला धब्बा, आंखों के सामने धुंधलापन, बुुखार, सीने में दर्द, खांसी, सांस लेने में दिक्कत, खून की उल्टियां, चेहरे पर चकत्ते धब्बे, जो सूखने पर सड़न के कारण गैंगरीन जैसे दिखता है।
 
इन रोगियों को खतरा ज्यादा
जिनका शुगर स्तर हमेशा ज्यादा रहता है।
जिन मरीजों ने कोविड के दौरान ज्यादा स्टेरॉयड लिया हो।
काफी देर तक मरीज आईसीयू में रहा हो।
ट्रांसप्लांट या कैंसर का रोगी हो।
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