गोरखपुर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस खादी को आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का प्रतीक बनाया था, वह अब बदलते दौर में नए अंदाज में युवाओं की पसंद बन रही है। गांधी जयंती के मौके पर खादी कारोबार की तस्वीर देखें तो गोरखपुर में इसकी चमक एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही है। युवाओं में कुर्ता-पैजामा, सदरी और गमछे का बढ़ता क्रेज खादी कारोबार को नई रफ्तार दे रहा है। यही वजह है कि जिले में एक साल में खादी उत्पादों की बिक्री करीब एक करोड़ रुपये बढ़ी है। पिछले वर्ष करीब 2.98 करोड़ रुपये की बिक्री हुई थी, जबकि इस वर्ष कारोबार चार करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की उम्मीद है।
गोरखपुर में खादी केवल पहनावे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का भी बड़ा जरिया बन रही है। जिले के सिकरीगंज, उरुवा, गोला बाजार, बड़हलगंज, उनवल, पिपराइच व चौरीचौरा स्थित केंद्रों पर बुनकर खादी के कपड़े तैयार कर रहे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से करीब 2210 लोगों को रोजगार मिल रहा है। महिलाओं को कत्तिन के रूप में काम करने के लिए सरकार की ओर से सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
38 स्टोरों से 3.98 करोड़ की बिक्री
गांधी आश्रम खादी भवन गोलघर के संचालक विश्वेश्वरनाथ तिवारी के अनुसार, पिछले वर्ष 38 स्टोरों को मिलाकर करीब 3.98 करोड़ रुपये की बिक्री हुई थी। इस वर्ष खादी उत्पादों की मांग में बढ़ोतरी को देखते हुए चार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार होने की उम्मीद है।
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गांधी के चरखे ने भी बदला स्वरूप
समय के साथ खादी तैयार करने का तरीका भी बदल गया है। कभी हाथ से चलने वाला महात्मा गांधी का चरखा अब मोटर, बैटरी और सौर ऊर्जा से चल रहा है। इससे कत्तिनों को कम मेहनत में अधिक काम करने में मदद मिल रही है। हाल ही में सरकार की ओर से 500 महिलाओं को आधुनिक सोलर लूम दिया गया है। बुनकरों को सस्ता धागा और कच्चा माल उपलब्ध कराने के साथ बिना गारंटी ऋण की सुविधा भी दी जा रही है।
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सदरी से गमछे तक युवाओं की पसंद
खादी के उत्पादों में युवाओं की पसंद भी बदल रही है। कुर्ता-पैजामा, मोदी सदरी और गमछा सबसे अधिक पसंद किए जा रहे हैं। खादी का कपड़ा करीब 220 रुपये मीटर से लेकर 1000 रुपये मीटर तक उपलब्ध है। सदरी की कीमत करीब 800 रुपये से शुरू होती है, जबकि गमछा 200 रुपये से मिल रहा है। इसके अलावा खादी आश्रम में तकिया, कंबल, ऊनी चादर, बेडशीट समेत कई अन्य उत्पाद भी उपलब्ध हैं। गांधी जयंती पर खादी की यह बदलती तस्वीर बताती है कि बापू के चरखे से निकला स्वदेशी का संदेश अब आधुनिक तकनीक और युवा फैशन के साथ नए रूप में आगे बढ़ रहा है।