खादी को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1920 में जेपी कृपलानी ने क्षेत्रीय गांधी आश्रमों की स्थापना की थी। इसका एक और मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार महिलाओं और लोगों को रोजगार देना था। मगर, अब यह अपने लक्ष्य से भटक गया है। यही वजह है कि खादी की खपत तो बढ़ी है पर इसका लाभ उसके असली हकदारों को नहीं मिल रहा है।
एक घुंडी सूत के मिलते हैं 7.50 रुपये पारिश्रमिक
कारीगर को एक घुंडी सूत (एक हजार मीटर) सूत काटने के लिए 7.50 रुपये पारिश्रमिक मिलते हैं।
क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम के सचिव विशेश्वरनाथ तिवारी ने कहा कि कारीगरों की कमी से गांधी आश्रम में खादी का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। डिमांड के बावजूद खादी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इसे दूर किया जाना आवश्यक है।