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आजादी का अमृत महोत्सव: अंग्रेजों के दबाव में नहीं आए थे भाई जी, राजद्रोह में कई बार गए जेल

Thu, 04 Aug 2022 12:20 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

 हनुमान प्रसाद पोद्दार उर्फ भाई जी अंग्रेजों के आगे नहीं झुके और अपनी कार नेहरू जी को दे दी थी। गीताप्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार उर्फ भाई जी बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। अंग्रेजों द्वारा कई तरह के अत्याचार के बावजूद वह स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
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हनुमान प्रसाद पोद्दार और पंडित जवाहर लाल नेहरू। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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गोरखपुर में 1936 में भयंकर बाढ़ आ गई थी। हजारों घर तबाह हो गए थे। इसकी जानकारी जब पंडित जवाहर लाल नेहरू हो हुई तो वह यहां दौरे पर आए। उनके आने से पहले अंग्रेजों ने लोगों धमकी दी थी कि अगर किसी शख्स ने पंडित नेहरू को कार उपलब्ध कराई तो उसका नाम विद्रोहियों की सूची में लिख दिया जाएगा।  

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अधिकांश लोग तो अंग्रेजों के खौफ की वजह से ऐसा नहीं करने के लिए मान गए। लेकिन, हनुमान प्रसाद पोद्दार उर्फ भाई जी अंग्रेजों के आगे नहीं झुके और अपनी कार नेहरू जी को दे दी थी। गीताप्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार उर्फ भाई जी बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। अंग्रेजों द्वारा कई तरह के अत्याचार के बावजूद वह स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।

उनके सहकर्मी गंभीर चंद दुजारे के पुत्र हरिकृष्ण दुजारे ने बताया कि गोरखपुर में नेहरू जी के आगमन पर कार देने पर अंग्रेजों ने उनका नाम विद्रोहियों की सूची में दर्ज कर दिया था।
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हथियारों के जखीरे को लूटकर छिपाने में दर्ज हुआ था राजद्रोह
कलकत्ता (कोलकाता) में आजादी के आंदोलन और क्रांतिकारियों के साथ काम करने के एक मामले में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार सहित कई प्रमुख व्यापारियों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। आरोप लगा कि इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के हथियारों के जखीरे को लूटकर उसे छिपाने में मदद की थी।

कलकत्ता में वह स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं. झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। इसके बाद लोकमान्य तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो भाई जी उनके संपर्क में आए, इसके बाद उनकी मुलाकात गांधीजी से हुई थी। बाद में वे जमनालाल बजाज की प्रेरणा से मुंबई चले आए। यहां वे वीर सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महादेव देसाई और कृष्णदास जाजू जैसी विभूतियों के संपर्क में आए।

मुंबई में मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की
मुंबई में उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। मुंबई में वे अपने मौसेरे भाई ब्रह्मलीन श्रीजयदयाल गोयन्दका के गीता पाठ से बहुत प्रभावित थे। उनके गीता के प्रति प्रेम और लोगों की गीता को लेकर जिज्ञासा को देखते हुए भाई जी ने इस बात का प्रण किया कि वे श्रीमद्भागवत गीता को कम से कम मूल्य पर लोगों को उपलब्ध कराएंगे। बस यही एक छोटा सा संकल्प गीताप्रेस गोरखपुर की स्थापना का आधार बना। 29 अप्रैल 1923 को गीता प्रेस की स्थापना हुई।
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