अमर उजाला आपको ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहा है। जिनका वजूद साजिश के जाल में फंसकर तिनके की तरह बिखर गया। शाहपुर इलाके के ज्ञानू तिवारी अमर उजाला की टीम से बातचीत के दौरान भावुक हो गए और बोले कि भाई साहब कुछ भी नहीं बचा, 14 दिन तो अपराधियों की तरह ही मैंने और परिवार ने गुजारे हैं। लगता था कि क्या कर दिए हैं।
हाथ बांधे ज्ञानू की आंखें भर आईं। बोले-थाने गया, पुलिस वाले यही पूछना शुरू किए बताओ हत्या किए हो या कराए हो? यह सुनकर सन्न रह गया। फिर कुछ देर बाद एसपी सिटी आए। उनके बात करने के बाद लगा कि नहीं मुझे इंसाफ मिल जाएगा, लेकिन उनके जाने के बाद फिर से पुलिस वालों के वही तीखे सवाल।
यह पूछने पर कि आखिर मन में क्या चल रहा था कि कैसे बचेंगे? बोल पड़े, यही लग रहा था कि अब तो कुछ बचा नहीं है। पूरी जिंदगी की कमाई इज्जत भी चली गई और वह भी बिना कुछ किए? पत्नी और घर की महिला को थाने में बैठा लिया गया था। इतनी जलालत कि हिसाब नहीं। किसी तरह से एक रिश्तेदार के जरिए बंगलूरू में रहने वाली एकलौती बेटी से बात हुई, उसे भी झूठा दिलासा दिया कि सब कुछ ठीक है, परेशान मत हो। मगर ऐसी परेशानी, ता जिंदगी नहीं भूल पाएंगे हम सब वे 14 दिन। पूरा परिवार यही दुआ कर रहा कि भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाएं।
यह था मामला
शाहपुर इलाके में सेंट जॉन गली में शिक्षिका डेविना उर्फ निवेदिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। बेटी को भी गोली लगी थी। उस समय चश्मदीद कोई नहीं था, लेकिन बाद में पति ने ज्ञानू तिवारी समेत तीन लोगों पर लूट की कोशिश के लिए गोली मारकर हत्या करने का केस दर्ज कराया था। वजह बताया गया था कि इनसे विवाद चल रहा था। उसी दिन से पुलिस ने ज्ञानू तिवारी, उनकी पत्नी व एक महिला रिश्तेदार को हिरासत में लिया और जांच में उनकी नामजदगी गलत पाई गई। शहर के शूटर पकड़े गए, जिन्होंने वारदात को अंजाम दिया था।
सबक सिखाने के लिए सख्त कानून है, पर पुलिस की कलम नहीं चलती
गोरखपुर पुलिस का वर्षों पुराना रिकॉर्ड खंगाल डालिए, मगर आईपीसी की धारा-194,195 के तहत कार्रवाई की शायद ही कोई बानगी मिले। यही वजह है कि झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता और गोरखपुर में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
आईपीसी की धारा 194: यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से दंडनीय किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह आजीवन कारावास या कठिन कारावास से जो 10 वर्ष तक हो सकती है और जुर्माने से दंडित होगा।
आईपीसी की धारा 195: जो भी कोई इस आशय से या यह संभाव्य जानते हुए कि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए, जो मृत्यु से दंडनीय न हो किंतु आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय हो, दोषसिद्ध कराने के लिए, मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, उसे भी वैसे ही दंडित किया जाएगा, जैसे आरोपी व्यक्ति के लिए दंडनीय तय होता है।
आईपीसी की धारा 177: जानबूझकर गलत सूचना देकर केस दर्ज कराना। इसमें छह महीने सजा और जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।
कानून में व्यवस्था मौजूद पर जिम्मेदार कतराते हैं
महिला अपराध के मामलों में खासकर, कोई पुलिस वाला रिस्क नहीं लेता। केस दर्ज किया और भेज दिया जेल। जिसे समझना है कोर्ट से समझे? कुछ मामलों में आला अधिकारियों के हस्तक्षेप पर जांच होती है, तब कहीं राहत मिलती है। मामला गलत पाए जाने के बावजूद पुलिस झूठी एफआईआर दर्ज कराने के दोषी पर कार्रवाई नहीं करती। जबकि, झूठा केस करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन जिम्मेदार अपना काम करना नहीं चाहते हैं।