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Gorakhpur: सुलोचना मल्होत्रा ने सुनाई विभाजन के त्रासदी की पीड़ा, बोलीं- व्यथित कर जाती हैं ये यादें

Mon, 22 Aug 2022 01:59 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।

सार

सुलोचना मल्होत्रा ने बताया कि मैंने कड़ी मेहनत, मजदूरी करके लोगों के घरों के कपड़े सिलकर अपने परिवार का पालन पोषण किया। उस कठिन वक्त में भी मैंने अपने लड़के को पढ़ा कर योग्य बनाया। वर्ष 1988 में मेरे बेटे को नौकरी मिली तब हम लोग गोरखपुर आ गए।
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विभाजन की विभीषिका का दंश झेलने वाली 92 वर्षीय सुलोचना मल्होत्रा को सम्मानित किया गया। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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1947 में देश के विभाजन के दौर की यादें व्यथित कर जाती हैं। कैसे भूल सकता हूं वह भयावह मंजर। पिता बचपन में ही साथ छोड़ गए थे। देश बंटवारे के बाद जब जुलूस निकला तो घर में भी लूटपाट हो गई। परिवार के बचे सदस्य किसी तरह जान बचाकर आए थे। इस सदमे मां भी चल बसीं। पुश्तैनी खेत, खलिहान, संपत्ति और मकान सब कुछ पाकिस्तान में ही रह गया। संघर्ष किया और वाहेगुरु जी, मातारानी की कृपा से नया जीवन शुरू हुआ।

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यह संस्मरण है देश विभाजन की विभीषिका का दंश झेलने वाली 92 वर्षीय सुलोचना मल्होत्रा की। 75 साल पुरानी बातें याद कर वह भावुक हो जाती हैं। वह रविवार को शहीद अशफाक उल्ला खां प्राणी उद्यान में देश विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित पांच दिवसीय फोटो प्रदर्शनी के समापन पर बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थीं।

बताया कि उनका परिवार देश बंटवारे के पूर्व पेशावर (पाकिस्तान) के तलहटी गांव में रहता था। 1947 में देश की स्वतंत्रता के समय अचानक वहां का माहौल काफी खराब हो गया। लूटपाट, मार-काट शुरू हो गई। वहां पर हिंदू, सिखों की जान को खतरा पैदा हो गया।

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कबायली लोगों ने अचानक हिंदू और सिख परिवारों पर हमला शुरू कर दिया था। हम लोगों की आंखों के सामने कई घर लूट लिए गए थे। अचानक मेरी माता सुरक्षा की दृष्टि से रात में मुझे और मेरे भाई को लेकर घर-बार सब छोड़ वहां से निकलीं। उस समय मेरी आयु 11 वर्ष की रही होगी। मेरा छोटा भाई 10 साल का होगा। हम लोगों के जत्थे में काफी लोग मारे गए थे। भारत पहुंच कर मां की भी सदमे में मौत हो गई।

 बताया कि किसी तरह कुछ रिश्तेदारों व लोगों के साथ जान बचा कर भारत आए। सोनीपत में राहत शिविर में जगह मिली। ये सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। संघर्ष तो था, लेकिन अपने देश में होने की वजह से खतरा नहीं था। धीरे-धीरे परिवार ने संघर्षों के बीच अपना जीवन आगे बढ़ाया।

 बताया कि मैंने कड़ी मेहनत, मजदूरी करके लोगों के घरों के कपड़े सिलकर अपने परिवार का पालन पोषण किया। उस कठिन वक्त में भी मैंने अपने लड़के को पढ़ा कर योग्य बनाया। वर्ष 1988 में मेरे बेटे को नौकरी मिली तब हम लोग गोरखपुर आ गए।

 कार्यक्रम में पशु चिकित्साधिकारी योगेश प्रताप सिंह, रेंजर राजेश पांडेय, डॉ. अनीता अग्रवाल, मल्लिका मिश्रा, नरेंद्र मिश्रा, मनीष चौबे, अनिल तिवारी, रोहित सिंह समेत अन्य लोग मौजूद रहे।
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