पूर्वांचल में सबसे पहले गैस इंसुलेटेड सब स्टेशन (जीआईएस) की मंजूरी तो शासन से पहले ही मिल गई थी। अब इसके लिए 79.97 करोड़ रुपये स्वीकृत हो गए हैं। गोरखपुर के खोराबार के पास जीआईएस पारेषण उपकेंद्र बनाने का काम जल्द शुरू हो जाएगा। उपकेंद्र में 60-60 एमवीए के तीन ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे।
इसे बनाने के बाद लगभग 13 करोड़ रुपये से बरहुआ पारेषण केंद्र से खोराबार तक नई लाइन भी खींची जाएगी। लगभग आठ किमी लंबी लाइन बनने के बाद पारेषण उपकेंद्र तैयार हो जाएगा। इस उपकेंद्र के शुरू होने से निर्बाध आपूर्ति का लाभ मिलेगा।
शहर में अभी 132 केवी पारेषण उपकेंद्र फर्टिलाइजर, 220 केवी पारेषण उपकेंद्र बरहुआ और 400 केवी पारेषण उपकेंद्र मोतीराम अड्डा से बिजली आपूर्ति दी जाती है। तीनों पारेषण केंद्र से वितरण खंड और उपकेंद्रों तक आपूर्ति जाती है। इनमें से मोतीराम अड्डा पारेषण उपकेंद्र से खोराबार और ग्रामीण के वितरण उपकेंद्रों को आपूर्ति दी जाती है।
इसके अलावा गोला बाजार में पिछले साल 220 केवी पारेषण उपकेंद्र से आपूर्ति शुरू की गई है। शहर की बढ़ती मांग को देखते हुए काफी समय पारेषण उपकेंद्र की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर बिजली निगम ने खोराबार में पारेषण उपकेंद्र की स्थापना का प्रस्ताव बनाया था। जगह को लेकर कुछ दिनों तक मामला फंसा रहा लेकिन अब संकट भी खत्म हो गया है।
180 एमवी की क्षमता होगी
खोराबार जीआईएस पारेषण उपकेंद्र में 60-60 एमवीए के तीन पावर ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे। इससे शहर के 12 से ज्यादा उपकेंद्रों को सीधे आपूर्ति दी जाएगी। उपकेंद्र शुरू होने के बाद बरहुआ और मोतीराम अड्डा पारेषण उपकेंद्रों का भार भी कम होगा। भविष्य में उपकेंद्र की क्षमता भी बढ़ाई जा सकेगी।
क्या होता है जीआईएस उपकेंद्र
गैस आधारित सब स्टेशन में सल्फर हेक्साक्लोराइड (एसएफ-6) गैस का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें ट्रांसफार्मर बाहर होते हैं, जबकि बाकी सभी उपकरण एक मेटल बॉक्स में बंद होते हैं, जिसमें गैस भरी जाती है। इसका कंट्रोल पैनल एक बड़े हॉल के बजाय छोटे कमरे में होता है। यही नहीं, ओवरलोडिंग न होने से ट्रांसफॉर्मर हीट भी नहीं होते। इससे ट्रिपिंग की समस्या नहीं होती।
जीआईएस उपकेंद्र से होने वाले फायदे
पूर्वांचल में पहला जीआईएस पारेषण उपकेंद्र बन जाने से उससे जुड़े इलाकों में निर्बाध आपूर्ति की व्यवस्था बहाल हो सकेगी। इससे ट्रिपिंग कम होगी, ब्रेकडाउन कम होगा, रखरखाव आसान होगा, मरम्मत में खर्च कम आएगा, ओवरलोडिंग की समस्या कम होगी, नए कनेक्शन बढ़ाए जा सकेंगे।